Sunday, April 17, 2016

यह जो धर्म हैं

मामूली से भी मामूली दर्शन और विचार को समझने के लिए आपको एक स्तर उठना पड़ता है।फिर मैं सोचता हूँ यह जो धर्म हैं, जिनमें विचार,सिद्धांत,प्रयोग का इतना विस्तृत हिस्सा है वह कैसे हर इंसान थाम लेता है।हज़ारों सालों से चले आ रहे यह धर्म कितने शक्तिशाली विचारो से उपजे हैं।लोग अक्सर कहते हैं वह धर्म मार्ग पर हैं।कुछ कहते हैं वह धर्म से ऊपर हैं।कुछ धर्म के चक्कर मेही नहीं हैं।मैं समझता हूँ की अभी बहुत ही सतही अवस्था में हूँ, धर्म को समझ रहा हूँ।मैं किसी बीही कर्मकांड या बाहरी आवरण को नही पसन्द करता।धर्म में कुछ तो था की हज़ारों सालों से,जानी अनजानी, पिछड़ी,जँगल, मैदान,पहाड़ सब जगह यह पहुंचा।कोई तो ऐसा विचार था जिसने लाखों लोगों को मुट्ठी बना दिया।मैं स्वाध्याय को महत्व देता हूँ।सोचता हूँ यह जो सतही विचार पचास सौ सालों में मुँह के बल गिर जाते हैं वह सबसे ज़्यादा हमला धर्म पर क्यों करते हैं।करीब से देखने में धर्म और कर्म कांड विपरीत ध्रुव जान पड़ते हैं।कर्मकांडो से अलग अलग पंथो की नीव पड़ी,जबकि मूल विचार यानि धर्म एक ही है।एक बार बिना बैर भाव के सभी पन्थो को पढ़िए,उनमे से सामान विचारों को छांटिये, तब देखिये क्या है।यही मूल है।यही धर्म है।आँख पर पट्टी बांध कर कर्मकांड करना आपको दुसरो से अलग दिखायेगा बस।मैं धर्म जैसे सशक्त विचार को समझना चाहता हूँ।देखना चाहता हूँ इसमें कौन सी ऐसी बात है जोयह आज भी मौजूद हैं।कोई धर्म खत्म क्यों नही हुआ।इसने सामाजिक ढाँचे को कैसे बुना।मैं धर्म के बाहर से नही धर्म के अंदर से समझ रहा हूँ।मानव की उतपत्ति से विकास।ईश्वर और उसके कारण को जान रहा हूँ, तब लगता है यह तो बेहद वृहद,विशाल विषय है।एक झटके में धर्म को ख़ारिज करना बेहद आसान है, मगर उसका गहन अध्ययन करके समझना जटिल विषय है।मैं लाखों बार कहता हूँ यह जो हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,बौद्ध,जैन या और भो जो हैं वह केवल कर्मकांड से अलग हैं वरना इनका स्रोत एक ही है।उसे समझना ही होगा।तब आप चाहें इन्हें माने या छोड़ दे।यह आपके विवेक का विषय है।बस सतही तरीके से इसे निपटाये मत।हफ़ीज़ क़िदवई

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