मैं अगर तुम्हारे विरोध से बिखर जाऊँ तो मैं हूँ हीं कब।मैंअगर तुम्हारे कहने से कोई मज़हब का सिपाही हो जाऊँ तो यह तुम्हारी भूल है।मैं जो हूँ वो हूँ,मुझे सालों में मेहनत से,मोहब्बत से,तरीके से गढ़ा गया है।मुझमे ऐसा कलफ़ है जो तुम्हारी गालियों,फब्तियों,इल्जामो से नही टूटता।यह कलफ तब ही टूटेगा जब खुद मुझमे बुराइयों की नमी आ जाएगी।
आज तुम सुन लो जो एक एक शब्द से मेरे प्रति विचार बदलते हो।शब्दों में तुम धर्म,संगठन,पार्टी सूँघते हो,मेरे नज़दीक़ तो पहुँच भी नही सकते।तुम शब्द में उलझोगे तब तक मैं तुम्हारे ईश्वर के कन्धों पर हाथ रखकर सैर पर निकल जाऊँगा।
तुम जबजब अपनी सोच की सलाखों में क़ैद मुझसे निराश होंगे,तब तब यह क़ैद और मज़बूत होगी।तुम्हे आज़ाद देखना मेरा मकसद है, मगर कैसे।तुम तो खुद जंज़ीरों से मोहब्बत कर बैठे हो।
तुम मेरे शब्द,शब्दों में छुपे अर्थ में मुझको कभी नही पाओगे।मैं तुम्हारे प्रश्नो के उत्तर के लिए कभी खूंटो में नही बन्ध सकता।मैं तुम्हारे दिमागों की परत में जमी काई को दूर करने का बेमतलब ख्वाब नही देखा करता।
मैं लिख रहा हूँ।पता नही उस लिखने में मैं हूँ भी या नही।बस जो सामने है वोह शब्दों में है।मेरी रूह शब्द अर्थ की मोहताज नही।न ही इस जिस्म को किसी मोहर की ज़रूरत है।यह एक ही पल में कृष्ण की बाँसुरी लेकर ईसा के कानों में बजाते हुए,ईसा की चादर छीनकर मोहम्मद के कन्धों पर डालकर,मोहम्मद की नालैन उतारकर राम के पाँव में डाल सकता है।मैं जो हूँ वोह तुम्हारी हदो से बाहर हूँ।इसलिए तुम मेरे शब्दों में मुझे ढूंढते हो,विरोध करते हो,गाली देते हो,,मोहब्बत करते हो,अपनाते हो।फिर भी बता दूँ ताकि सनद रहे की इन गुने हुए शब्दों में सिर्फ शब्द हैं।रूह से रूह तक पहुँचो।मैं रूह में झाँकता हूँ तुम्हारी तो मुस्कुरा देता हूँ।
शब्द चुभ सकते हैं रूह नही चुभती।रूह को वही महसूस करेगा जो शब्द के प्रभाव से बाहर आ जाएगा।हैशटैग शब्दों का ढेर मात्र है।आओ मुझसे मिलो।मेरे पास बैठो,तब देखना यह शब्द बड़े हैं या हमारा तुम्हारा साथ।दो रूहे शब्दों की ज़ंज़ीर को तोड़कर ईश्वर के द्वार खोलती हैं।आओ जंज़ीरों को तोड़कर आमने सामने,आँखों में आँखे डालकर चरित्र,धर्म,संगठन,रँग,रूप,मानवता,धैर्य,समर्पण,त्याग,तपस्या पर बात करें।तब ही तो मेरा तुम्हारा साक्षात्कार होगा।आओ मिलकर ईश्वर का रूप गढ़े
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