Monday, December 19, 2016

निवाला


सफेद बाउंड्री के बीच हरा हरा लॉन।अंदर पाँव रखते ही बड़ा सा वारामदा।अंदर कमरों और आँगन के बाद डायनिंग रूम।डायनिंग रूम में बड़ी सी डायनिंग टेबल।उसके एक किनारे पर इटली की खूबसूरत चीनी की पलेट।पलेट की नक़्क़ाशी में मछली का जाल।उस जाल पर आलू के दो क़त्ले और बेडौल सी एक तवे पर सूखी रोटी।आलू भी रह रह शिकायत कर रहे की हमें तो ठीक से पकाया होता।

सादा सफेद कुर्ता पहने वोह टेबल के एक किनारे एक लुकमा खाता और रोता।एक टुकड़ा तोड़ता और रोता।घर में बिखरे पड़ी अमीरी की नफासत और नज़ाकत को देखता और चिटखी हुई रोटी को देखता ,आँखे भर आती।नौकरों की कतार को देखता और पानी में डूबे नमक मिले आलू देखता तो गले में निवाले फंस जाते।सब उसके इर्द गिर्द खड़े उसे आलू और सूखी रोटी खाता हुआ देख रो ही सकते थे।

कल उसकी बीमार माँ ने पूरे 4 साल भर बाद बावर्चीखाने में पैर रखे थे।किसी तरह रुक रुक के, उठ बैठ के आलू और रोटी बनाई।वोह इन रोटियों को कल से खा रहा था।उन फीके आलुओं में माँ का दर्द था।उस सूखी रोटी में माँ की सूख चुकी खाल थी।

माँ का मन और हाथ से छुआ सूखा आटा भी वोह मज़े दे रहा था की पूरा गाल आँसुओं से तर था।


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