Tuesday, December 6, 2016

यह जो रँग है

सर्द मौसम और रँग।।।ज़िंदगी में जो लहर ज़ायका लाता है उसी को आसमान तक ले जाते हैं यह रँग।।रँग ज़िंदादिली की अलामत हैं।रँग जब हमारे मायूस ख्वाबों पर छींटों की तरह बिखर जाते हैं तो ख्वाब ज़िंदा होकर आँगन में चहलकदमी करने लगते हैं।हम फूल से रँग निकालना नही जानते,रँगो से कपड़ो को छींटे देना नहीं जानते मगर अपने खूबसूरत जिस्म को रँग से निखारना ज़रूर जानते हैं।हमारी जेनरेशन तो इन्हे यलो,पर्पल और रेड में ही महसूस करेगी और उससे पहले वाले लाल,हरे और नीले में ले जाएगे लेकिन अवध की ड्योढ़ी में यह कुछ दूसरे नामों से ज़िंदा थे।कुछ घरों में शायाद आज भी हों या उन्हे पुकारने वाले हमारी ज़िंदगी से हौले से निकल गए।जिन्हे हमेशा हमने ब्लैक एड व्हाईट तसवीरों में देखा यह उनकी ज़िंदगी के रँग  तूली,माँशी,धानी,फालसई,आसमानी,दूधिया,ऊदा,कत्थई,सुर्ख़,फ़िरोज़ी,जामुनी,गेरूआ,मटमैला,ज़र्द,गेहुँआ,भूरा,सब्ज़,कपासी,रूपहला,मूँगिया,फ़ाख़्तई और सियह पूरा एक ज़माना थे।कुछ पक्के थे कुछ कच्चे।मगर वक्‍त ने कच्चे रँगो के साथ पक्के को भी फीका कर दिया।पता नही आप इनमें से कितने रँग पहचान पाएगें ,बस इतना पता है यह रँग आप रोज़ पहनते हैं और यह आपका शोख़ अदाज़ फ़िज़ा में उड़ेल देते हैं यह जानकर भी की आप इन्का रवायती नाम नही जानते ।रँगो को एक बार उनके पुराने नाम से पुकारिए तब देखिए इनकी खिलखिलाहट।फिर यह बेजोड़ मुस्कान लिए आप पर खिल उठेंगे।आपको रँग ही नही रँग की खुशबू भी आने लगेगी।

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