एक लम्बी सी दीवार थी।खूब ऊँची,सपाट, खूबसूरत,मज़बूत सी दीवार।उसके पीछे से कभी ठहाकों की अवाज़ आती तो कभी रोने की।कभी बच्चों के खेलने की तो कभी लड़ने की आवाज़।दिवार मज़बूत भले ही थी मगर वोह आवाज़ को नही रोक पा रही थी।
इधर की भी खुशियों की झनकार,रोने की कलकल,हँसने की खूबसूरत आवाज़,सिर्फ आवाज़ उधर जाती ही होगी।इस दीवार ने दोनों तरफ दो लोगों,दो परिवारों,दो खानदानों,दो सभ्यताओं,दो धर्मो,दो विचारों को कैद कर रखा है।कुछ को लगता है ऐसी लम्बी,ऊँची,सपाट दीवार उन्हें हिफाज़त देंगी।मुझे लगता है यह तो क़ैद है,खुद को गुलाम बनाने की अहमकाना हरकत है।
मेरी दीवार ऊँची,लम्बी,मज़बूत सब होगी मगर उसमे बड़ी बड़ी खिड़कियाँ होंगी।जिनसे मैं दूसरे की तक़लीफ़ में मरहम,आँसू में रुमाल,ख़ुशी में मुस्कुराहट,जीतने में बधाई,हारने में ढाँढस दे सकूँगा।यह खिड़कियाँ हमारे होने का एहसास होती हैं।इनसे मोहब्बत पैदा होती हैं।यह घर का ट्रेलर होती हैं।खुली खिड़की घर के खुशदिल इंसान की गवाही देती हैं।जो इन्हें बन्द करके दीवार बनाते हैं वोह अपनी ज़िन्दगी में सीलन को न्योता देते हैं।
दो धर्मो के बीच दीवार होना कोई बड़ी बात नही रही।फिर भी हमारे बुज़ुर्गों ने इसमें खिड़कियाँ खोली,जानते हैं वोह खिड़की कया है।त्यौहार।जिस धर्म में यह त्यौहार की खिड़की बन्द हो गई वोह धर्म क़ैद हो गया,अपनो के हाथों क़ैद।
मुझे तो दीवार ही नही पसन्द फिर भी दो दिलों में अगर दीवार ज़रूरी हो तो खिड़की ज़रूर रखिये,वरना खत्म हो जाइयेगा ,घुट घुट के,बन्द दीवारों में,एक ही रँग में,एक रँग मुर्दे की निशानी है।खिड़कियाँ खोल दो।।।
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