Wednesday, December 14, 2016

इस दर्द का इलाज क्या है।


अरे पैर बचा के रखिये,नीचे ख़ून है।देखिये कहीं आपके रीबॉक के जूतों में यह ख़ून लग न जाए।टथोड़ी मोहरी चढ़ा लीजिये।अरे उधर मत देखिये,वोह कुछ फ़ालतू के बच्चे थे,उनका मरना ज़रूरी था।सर नीचा कर लीजिये वरना सामने दीवार पर चपकी उस खूबसूरत लड़की की खाल कहीं तुम्हे रोक न ले।वैसे मुँह पर रुमाल मत रखो क्योकि ताज़े ख़ून में बदबू नही होती।यहाँ ख़ून बासी भी नही होने पाता उस पर ताज़ा ताज़ा भाँप उठता ख़ून फिर बहा दिया जाता है।यह तस्वीर उस अरब की है जिसकी ज़मीन में तो तेल है मगर दिल ओ दिमाग में आग है।

रूस और ईरान तुम सीरिया के साथ जो कर रहे हो अगर वोह शाँति है तो ख़ुदा तुम्हे उस शाँति में ही भस्म कर दे।हुक़ूमत करने की पागलपन के हद तक की चाहने तुम्हे भेड़िया बना दिया है।तुम्हारे हुक़्मुरानो के दाँतों में इंसानियत की बोटी के रेशे हैं।होंटो पर ख़ून की छींटे।तुम दिल में इस्लाम रखकर कैसे वहशी हो लेते हो।हमे अभी अपनी यह नायाब आर्ट सिखादो न।जिस पुतिन के साथ मिलकर तुम अपने लोगों के ख़ून की फुहार देख मुस्कुरा रहे हो,वोह वक़्त पड़ने पर तुम्हारे ख़ून से मुँह धोने से नही चूकेगा।

मुझे अंतर्राष्ट्रीय राजनीती मत सिखाना।न यह कहना की इन्हें कौन मार रहा है।न मरने और मारने वाले का मज़हब बताना।सीधे से उस रेत में बहता ख़ून तुम्हारे वहशी होने का सबूत है।मैं UN जैसी संस्थाओ को सिर्फ नर्स की शक्ल में देखता हूँ।जो ज़ख्मो पर सिर्फ मरहम रख सकता है मगर ज़ख्म आने से रोक नही सकता।

और तुमको क्या कहें मुसलमानों।तुम्हारी ज़बानों पर गालियाँ और दिमाग में हद दर्जे नफ़रत पैबस्त है।तुम हुकूमतों,सियासत की लड़ाई को फिरकों के खाँचो में डालकर पहले भी बहुत कुछ गवा चुके हो।तुम ज़ख्मो में सिर्फ अड़ोस पड़ोस के मदद न करने पर चीखते हो,जबकि खुद कभी किसी की मदद को आगे नही आते हो।

हमे एक संगठन बताओ जो तुम्हारा दुनिया की ख़िदमत में लगा हो।सर उठाओगे तो क़ौम देखोगे।सर झुकाओगे तो क़ौम के गम देखोगे।इससे बाहर भी लोग हैं।उन्हें भी ज़रूरत है।

मैं अभी कह रहा की अगर बुरे होते हालात से निपटना है तो खुद बेहतर हो जाओ।दर्द में चीखो नही,ताने मत दो,दूसरों पर तंज मत करो।इससे निकलने का रास्ता खोजो।ज़ख्म की पपड़ी कोई भी उखाड़ सकता है मगर मरहम सिर्फ चन्द लोग रखते हैं।

अरब की ज़मीन पर उधेड़ती इंसानियत का ग़म है, हाँ अगर वाक़ई दिल से है।तो अपने पड़ोस में परेशान,दर्दमंद का सहारा बनो।तुम अरब नही जा सकते तो अपने पड़ोस के यतीम बच्चों,रेप से टूटी लड़कियों,हाथ पैर खो चुके लोगों,बेवाओं की मदद करो न।यह मुश्किल है, मगर राहत भरा है।रोने को जितना चाहे रो,चीखना हो जितना चाहे चीखो,मगर इससे उस माटी का ख़ून न धुन्धलाएगा और न तुम्हारे दिल को क़रार आएगा।

मोहब्बत,इंसानियत की समन्दर पार अपीलों से बेहतर है अपने घरों,मोहल्लों,कस्बो,शहरोंमें क़ायम करो।यक़ीन जानो तुम्हारा ख़िदमत करता जिस्म सीरिया में बिखरी हुई रूहों को सुकून देगा।रसूल भी तो दर्द में चीखते नही थे,बोलियाँ नही बोलते थे।मदद करते थे।इंसानियत की नज़ीर रखते थे।आसुंओं को आँखों में भरकर दूसरों के तलवों के काँटे निकालते थे।अभी देर नही सम्भल जाओ।तुम ही इस ज़मीन को खूबसूरत कर सकते हो ऐ इंसानों।यही हर ज़ुल्म को बेहतर जवाब है।

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