Saturday, December 10, 2016

मदद और विरोध साथ रखो

हाँ तो दो चीज़े साफ़ कर दूँ की चाहे जितनी ठण्ड पर जाए मेरी आत्मा नही मर सकती।दूसरी मैंचाहे जितने आराम की ज़जिंदगी गुज़ार दूँ मगर दूसरे की तक़लीफ़ से मुँह नही मोड़ सकता।
पता नही वोह कौन से लोग हैं जिन्हें किसान,गरीब,मज़दूर का दर्द दर्द नही लगता।मैं अभी कह रहा यह जो बेहिस मिडिल कलास है, जिसकी हर चीज़ अपने से शुरू होती है और अपने पर खत्म उसका भी नम्बर शुरू हो जाएगा।परेशानी जब गरीब के बर्तन तोड़ चुकेगी तब वह इनकी डायनिंग टेबल पर भी आएगी।अभी इनका मौन इन्हें ही डसेगा।
अमीर वर्ग को क्या कहें,उनके पास यहाँ खाने को नही होगा तो खाना खुद दौड़ कर उन तक आएगा।अखिर अमीर को मरने ही कौन देना चाहता है।कौन चाहेगा की अमीर मरे।अमीर पर सौ गरीब कुर्बान।10 मिडिल क्लास कुर्बान।कोई सरकार अमीर को मारकर सरकार ही कहाँ रह सकती है।
जिन्हें लग रहा हालात सामान्य है वोह शायद अभी रज़ाई से बाहर की दुनिया नही देखे हैं।जिन्हें लग रहा कल की सुबह नया सूरज लेकर आएगी यह वही लोग हैं जो इम्तहान में 5 सवाल हलकरके 20 सवालों भर के नम्बर दुआ में माँगा करते हैं।यह वही लोग हैं जो सरिहन अल्ट्रासाउंड में पेट में लड़का देखकर डिलिवरी के वक़्त लड़की होने की प्रार्थना करते हैं।हालात बुरे हो चुके हैं।लोगों के घर खाना खत्म हो रहा है।उनसे बेगार लिया जा रहा है।शोषण का नया काल सामने है।
यह वक़्त शोषण और मानवीय संवेदनाओ के खत्म होने के लिए हमेशा याद रखा जाएगा।तुम बनाओ अपने घरों की दीवारेंसुनहरी ईंटो से,मैं तो गिरते झोपड़े को ही लिखूंगा।तुम अपनी थाल में नाचती पनीर और पराठे में मस्त रहो।मैं तो सुदामा की टूटती पात को ही लिखूंगा।मेरी आत्मा ज़िंदा है।मेरी आँखे खुली हैं।उनसे दिखता है।गरीब का दर्द।
मैं खाना कम कर चूका हूँ।निवाले पुरई ,सागर और कुँवारे के चिपके पेट को देख फंसते हैं।कभी न माँगने वाली दर्शन की बेवा लक्ष्मी जब आटामाँगती है तो दिल फट पड़ता है।तुम नही देख पाओगे यह।क्योंकि तुम वोह हो जो हमेशा शुतुरमुर्ग की तरह लम्बे लम्बे डग भरता हुआ भागता जाता है और अपनी ताक़त और कद से किसी की हिफाज़त नही करता।जैसे ही मुसीबत आती है तब सर रेत में घुसा खुद को खुद से छुपाताहै।
ज़िंदा हो तो ज़िंदा नज़र आओ।मदद और विरोध दोनों झण्डे दोनों हाथो में लेकर चलो।एक झण्डा कभी निर्माण का सूचक नही रहा।

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