Sunday, December 4, 2016

बेकल उत्साही

हाँ मैंने बेकल उत्साही को देखा है।बलरामपुर के चबूतरे से उठा चराग़ दिल्ली की चौखट तक रोशन होते देखा है।हो सकता है मेरी उम्र उस चराग़ के उरूज से शुरू होती हो मगर फिर भी कह सकता हूँ की मैंने बेकल को,बेकल के बचपन से देखा है।उनका ख़ामोशी से सफेद चादर पर आकर चुपके से बैठना देखा है।जैसे कोई बच्चा बहुत सी चीज़ें को चुपचाप छुपाकर साथ लिए खामोश बैठा टुकुर टुकर सबको देख रहा हो।जब मौका आएगा तो यह बच्चा सबकुछ महफ़िल में लुटाकर फिर खामोश आगे बढ़ जाएगा।मैंने बेकल में वही बच्चा देखा है।जब वोह हाथों में उभरी हरी हरी नसों से माईक पकड़ते,लगता की आज दिल निकल कर बाहर आ जाएगा।जब ज़बान अपना पहला लफ़्ज़ फोड़ती,तो अवध की दहलीज़ तड़प कर,सिमट कर उन अल्फ़ाज़ों में गूँथ जाती।जैसे ही एक शेर हवा में उछलता,गँगा तड़प उठती यमुना को गले लगाने मगर हाँ मगर फिर वोह गले को अंदर तक खंगालते।इतना खंगालते की दिल और दिमाग मथ जाते और वोह गीत निकलता जो गंगा को सुकून देता और वोह फिर ख़ामोशी से बहने लगती।
मैं अभी भी उनके किमाम की खुशबू को पास महसूस कर रहा हूँ।मेरे इर्द गिर्द बेकल के अशआर बिखरे पड़े हैं।उनकी आवाज़ मुझे मेरे अल्फ़ाज़ को बार बार बदल रही है।मैं चाहता हूँ की उनके कुछ शेर लिखूँ मगर बेकल चुप्पे से कह रहे हैं की शेर में क्या रखा है, तुम बेकल पर लिखो।बेकल की ज़िन्दगी को लिखो।यह दिखा दो इन्हें की बेकल के शेर और ज़िन्दगी में झीना पर्दा भी नही था।यह भी बता दो बेकल एक सूफ़ी और एक हरदिल अज़ीज़ पण्डित के मुँह से निकले लफ़्ज़ों से बना था।मज़बूती से कलम थामकर कह दो की यह मोहम्मद शफी खान लोदी तब ही ढल गया था जब वारिस शाह के फ़क़ीर मुरीद ने कहा था "बेदम गया,बेकल आया।"यह भी कह दो उस दिन बना बेकल महात्मा के शिष्य पण्डित नेहरू के लक़ब "उत्साही" से यह नाम पूरा पड़ा।तुम कह दो बेकल उत्साही नाम ही दो सफों का एक सफ बनना है।दो तहज़ीबों का एक होना है।
बेकल ने बलरामपुर यूपी के एक छोटे से गाँव की ज़मीदार के घर पहला पाँव रखा था तब किसने सोचा था की यह एक नज़ीर बनेगा।जब वोह अपनी ज़बान से लफ़्ज़ गूँथ रहे थे किसे पता था की यह ज़बान की माला बनाएगा।बेकल गाँव के स्कूल की बोरी पर बैठकर नामचीन यूनिवर्सटी का सब्जेक्ट बनेंगे किसने सोचा था।पढ़ाई के लिए ज़िला दर ज़िला,क़स्बे से शहर भटकता हुआ वोह कब खुद में एक इंस्टिट्यूट बन जाएगा,कौन सोच सकता है।जब लोग अपनी अपनी ज़बानों की मगरूरियत में थे तब वोह अवधी को उठाकर महफ़िल में उरूज दे रहे थे।अवधी, हिंदी,उर्दू को मिलाकर बेकल ज़बान गढ़ गए।
हमको लगता है बेकल चले गए।जबकि सच यह है की मोहम्मद शफी खान लोदी की उम्र पूरी हुई है।बेकल तो मरा नही करते।जब तक गंगा में वज़ू होगा,बेकल रहेंगे।जब तक कृष्ण के पास रसख़ान है तब तक बेकल हैं।बेकल उत्साही इस पूरे दौर का एक अलग दौर हैं।जिनकी ज़िन्दगी ही कलम बनकर कागज़ों पर उतर गई।वोह जो अवध की ज़बान को अवध के मालिकों से ज़्यादा दूर ले गया।वोह जो तुलसी के पैतयाने बैठा।वोह जो जायसी के सरहाने खड़ा रहा।वोह जो रसख़ान के साथ खड़ा रहा।वोह जो खुसरु के बगल में लेट गया।वोह जो उर्दू,हिंदी,अवधी को मिलाकर,सिर्फ ज़बानें ही नही बल्कि तहज़ीब को एक करके चटख रँग के साथ निखरा वोह ही तो हम सबका बेकल उत्साही था।
फिर लिखे दे रहा हूँ बेकल मरा नही करते,तहज़ीबें भला कब मरती हैं।बेकल उत्साही कोई नाम नही थे।कोई मज़हब नही थे।कोई इंसान नही थे,वोह एक तहज़ीब हैं।जो हम सबमें हैं।

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