Monday, December 12, 2016

तुम हो क्या

मैं प्रेमचन्द का कुर्ता नोच लेता।ग़ालिब की टोपी उतार लेता।खुसरु का दिमाग़ निकाल लेता।इक़बाल का कोट उतरवा देता।कबीर का करघा छीन लेता।तुलसी की सियाही उलट देता।साहिर की नज़्में फाड़ देता।मंटो का कलम छीन लेता।मजाज़ की शेरवानी पहन लेता।तब भी कुछ न होता।
यह सब के सब मुस्कुरा देते या गहरी नज़र से देखते मगर कहते कुछ न।यह वोह थे जिनकी कलम ऊपर से तराश कर आई थी।मगर एक बार अभी के चार लाइन लिख कर मगरूरियत से इतराते हुए चलने वाले कलमकारों को देखिये।यह अपने कन्धों पर हाथ भी रखना बर्दाश्त नही करेंगे।बेहद अक्खड़ मिजाज़ जावेद अख्तर को साहिर ने मोहब्बत की शाल ओढ़ाई।ज़खमो पर नरमी के फाहे रखे।अब कौन साहिर,कौन जावेद।
तुम बात हिन्दू मुस्लिम की करते हो,यहाँ तो हर एक आपस में बटा हुआ है।कलम को संघो के खाँचो में बाटा गया और इलज़ाम दूसरों को।अपने अपने स्टेज,अपना अपना लेखक।एक दूसरे को दोयम दर्जे का लेखक मानते हुए अपनी ही धुन पर इतराते हुए लेखक।
मुझे अब इनकी कलम से वोह खुशबू नही लगती जो दिलों को जोड़े।जो राह दिखाए।जो ऊपर उठाए।जो समझाए।जो आगे बढ़कर थाम ले।हो सकता है मैं गलत होऊं मगर दिल कहता है उसे अपने ऊपर मत बैठाओ जो लोगों में नफरत बाँटे।जो घमण्ड में चूर कलम चलाए।
आप ऊपर के लोगों को देखिये और जो इनको पढ़कर लेखक बने उनके गुरूर को देखें।सब दिख जाएगा।
मैं अभी कह रहा की कलम में ताक़त लाओ,दुनिया खुद बखुद पलकों पर बैठाएगी।
मगरूरियत और किसी को कम समझना अगर तुम्हे लगता है की तुम्हे ऊपर ले जाएगा तो यह गलतफहमी है।आमतौर पर अब लेखक रस्सी की तरह है।रस्सी मत बनो।रस्सी आपके अलावा दूसरों को बाँधती है।बढ़ने से रोकती है।अगर रस्सी बनना ही है तो कुँए की रस्सी बनो जो नीचे से ऊपर आए।प्यास बुझाए।

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