बारिश छोड़ इस मौसम में अमरुद मीठे होते हैं।खासकर तराई इलाकों के अमरुद।अब मोमफली भी मीठी और सौंधी हो चली है।चने का साग धनिया की चटनी।सिंघाड़े की गूदी और चटनी।मैं अभी कॉफी और सूप पर पाँव नही धर रहा।
ठण्ड में यह भी अच्छे मशगले हैं।मगर मैं भुनी शकरकन्द के मुकाबले हर तरह का सूप नकार सकता हूँ।मैं भुने कच्चे चनो की खुशबू के आगे बहरैन के परफ्यूम को भुला दूँ।मुझे लगता है कुदरत ने सर्द मौसम को खुद अपनी कुरेशिया से गढ़ा है।
गुलदाउदी के फूल हर तरफ मुस्कुराते दिख जाएँगे।मैं यहाँ तुम्हे मौसम की जानकारी डदेने नही लाया।मैं तुम्हे रूसे के सफेद फूल की मिठास नही बता रहा।मैं तुमसे कह रहा हूँ।
गर्दन घुमा कर देखो कुदरत ने हर रँग,हर खुशबू, हर ज़ायके को हमारे दामन में टांका है।यानि कुदरत चाहती है की हम उसकी वैरायटी को महसूस करें।लिहाफ में लिपट कर मोमफली खाएँ, तो टहलते हुए अमरुद।
तालाब से सिंघाड़े निकलता कहार और बालू से मोमबत्ती खोदता किसान कभी नही सोचता की उसकी मेहनत सिर्फ एक तरह के लोगों के मुँह में लगे।ऐसे ही कुदरत है जो सिर्फ एक मज़हब या एक सोच के लिए कुछ उगाए।
मैं कहता हूँ तुम ईस वक़्त ठण्डी हुई माटी में ननंगे पाँव उतरो।माटी की ठंडक टतुम्हे इंसानबना देगी।तुम्हे सब चीजों का ज़ायका आ जाएगा।
मौसम की हर चीज़ चखो ताकि तुम फैक्ट्री फ़ूड से बाहर निकलो और इंजेक्शन से दी गई नफ़रत से भी बाहर आ जाओ।
अमरुद अधपका खाना,मीठा होगा।तुममे मौजूद कुदरती मिठास की तरह।
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