मुझे आज भी शक होता है की कोई ख़ुदा है।पता नही क्यों जब फलों से लदे बाग़ को देखता हूँ तो कह उठता हूँ की हाँ ख़ुदा तो है।पर जैसे ही पुरई की ख़ाली थाली देखता हूँ तो कह उठता हूँ ख़ुदा नही है।
मैं जब झूले पर झूलती और आइसक्रीम से तबियत भरने पर कोन को फेकती बच्ची की मुस्कान को देखता हूँ तो यक़ीन हो जाता है ख़ुदा इस मुस्कान में है।तभी डबडबाई आँखों से पॉलिश नँगे बदन जूतेको पॉलिश करने के लिए भागते बच्चे को देखता हूँ और ख़ुदा से दिल हट जाता है।
मैं आजतक क्यों नही सोच सका की मेरा ख़ुदा लदे फलों,भरी थालियों,मुस्कान में होने के बावजूद आसुंओं से क्यों दूर भाग जाता है।एक ही वक़्त में वोह भूख से सैकड़ों की आँखों में आँसू लाता है तो उसी वक़्त वोह उन आसुंओं का नमक सैकड़ो की बिरयानी में उड़ेल देता है।
मैं इसे बेइंसाफी नही कहूँगा।न मैं ख़ुदा के वजूद पर हाथ धरूँगा।मैं सिर्फ तुमसे पूछता हूँ की मेरी थाली और पुरई की थाली में इतना फ़र्क़ क्यों।मेरी आँखों की चमक और दूसरी डबडबाई आँखों में इतना फ़र्क़ क्यों।अगर यह फ़र्क़ ज़रूरी है तो मेरा दिल ऐसा क्यों बनाया।क्यों मुझे अपने निवाले गले में फंस कर उतरते हैं।बोलों न,या सिर्फ तारीफ़ के लिए हो।या तुमसे भी सवाल नही किये जा सकते हैं।
तुम मेरे दिल में मौजूद इन आँसुओ की गिरह को खोल दो,मैं पैदल चलता चीखता जाऊँगा की हाँ ख़ुदा है।हाँ मैंने देखा है ख़ुदा।मैं ज़मीन के खुदाओं और तुम्हारे नाम की रजिस्ट्री अफसरों के फतवों से रत्ती भर नही डरता।मुझे पता है अगर मुस्कान है तो तू है।अगर बहार है तो तू है।यहाँ तक अगर आँसू भी है तो तू है।मगर इंसानी ज़िंदगियों में अगर इंसान और जानवर का फ़र्क़ है तो मुझे शक है।
पता नही तुम क्यों नही हाथ घुमाते हो की हर बच्चे की आँखों के आँसू चमक में बदल जाए।पता नही तुम्हारा हाथ क्यों पुरई को खाना देते देते रुक जाता है।पता नही क्यों तुम पलँग पर लेटे चारो बच्चों के पेट ख़ालीरख हमे नींद दे देते हो।यहाँ मौजूद तुम्हारे फ़र्ज़ी सिपाही नहीं समझेंगे मगर तुम तो मेरे दिल की कैफ़ियत समझो ए मेरे ख़ुदा।बताओ करूँ तो क्या करूँ सिवाए तुमसे शिकायत के,सिवाए तुमसे लड़े, सिवाए तुम्हारे कौन है जो इतना बर्दाश्त करसकता है।मेरा दिल क्यों नही फट जाता यह सब देखकर,तब लगता है की हाँ तुम हो।जो दिल को सख्त किये जा रहे हो।
No comments:
Post a Comment