Wednesday, December 21, 2016

कृष्णीसा

कल हम कृष्ण की उँगली पकड़े हुए चले जा रहे थे।मेरे कृष्ण को सहारे की नही बस साथ की ज़रूरत है।जो दिल की धड़कन को सुने और महसूस कर सके।रास्ते में गंगा पड़ी।उनके इशारे को समझते हुए हमने एक काँसे में गंगा को समेट लिया।गंगा ने मुस्कुराते हुए इशारों में कहा की यह दो चार क़तरे नही हैं, यही तो पूरी गंगा है।मैं लपक कर फिर कृष्ण के पीछे हो लिया।पता नही वोह किधर जा रहे थे,बस दिल कह रहा था की उनके पीछे चलते रहो।
चलते चलते कब मिटटी से रेत,रेत से पहाड़ आ गए पता भी नही चला।एक पहाड़ की चोटी पर पहुँच कृष्ण ने पूछा अच्छा बताओ,किसी अपने को मैं अपनी कौन सी चीज़ दूँ,जो उसे भी ख़ुशी दे और मुझे भी।मैं भी बिना रुके बोला,बाँसुरी।।वोह मुस्कुरा दिया।

हम फिर एक गुफा में दाखिल हुए।उसमे एक टाट के टुकड़े पर कोई लेटा हुआ था।हल्के सफेद और काले से लम्बे लम्बे बालों ने कन्धों को ढक रखा था।अचानक हम दोनों के आने से पास में खड़ी भेड़ मिमयाई।वोह शख्स उठ गए मैंने देखा कृष्ण थोड़ा सा ही झुके थे की उन्होंने लपक कर कृष्ण को गले लगा लिया।मैं दूर खड़ा देख रहा था कृष्ण मिलकर रो रहे थे।लग रहा था अरसे बाद जिस्म रूह से मिला है।इस क़द्र मोहब्बत,दोनों सिसकियों से रोए जा रहे थे।कृष्ण ने मुझसे कहा गंगाजल दो।मैंने देखा जो जल मेरे हाथों में है वह हूबहु कृष्ण और उनके उस दोस्त की आँखों में है।कृष्ण ने वोह जल उनको दे दिया।

फिर आँखे पोछकर कमर से बाँसुरी निकालकर मुस्कुराते हुए कृष्ण ने उनके हाथ में रखी और अपना मोरपंख निकालकर उनके बालों में फंसा दिया।फिर कहा जब मैं अपनी भूमि से चला तो समझ न आया क्या ले चलूँ।फिर दिल ने कहा गंगा की शीतलता इस कड़ी चट्टान में आपके पाँव को सुकून देगी।यह बाँसुरी आपको मेरे करीब रखेगी।यह मोरपंख हमारी मुलाकात की पहचान बनेगा।

मैं तब चौका जब मेरे कृष्ण ने उनको ईसा कहा।और कहा की आपके जन्मदिन पर मैं और क्या लाता।सब कुछ तो आपका ही है।ईसा मुस्कुराते हुए बोले।हे कृष्ण तुम हो तो हम हैं।हम हैं तो तुम हो।यह लो मेरी चादर,यह तुम्हे बाँसुरी की कमी नही लगने देगी और अपनी चादर कृष्ण को उढ़ा दी।कृष्ण, जब मैं जन्माष्ठमी में आया था तब तुमने यहाँ आने का जो वादा किया था,वोह पूरा किया।मेरे पास तुम्हारी तरह गाय का मक्खन नही है मगर भेड़ का दूध है।लो पियो।
अचानक मेरे आँसुओं से निकले शोर से दोनों ने गर्दन मोड़ी।मेरे मोटे से आँसू देख दोनों मुस्कुरा दिए।मेरे कृष्ण ने मुझे भेड़ का दूध दिया,तभी ईसा ने उसमे गंगा के दो क़तरे डाल दिए।और कहा,लो हो गया मुक़म्मल।

मैं कृष्ण की ऊँगली पकड़े इंसान बना,लौट आया।अभी भी बाँसुरी की अवाज़ मेरे पीछे है और कृष्ण की उँगलियों की गरमी मेरे साथ।ईसा के टाट की धूल कृष्ण के मोरपंख की तरह चेहरे पर बिखरी पड़ी है।

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