Wednesday, December 7, 2016

सिर्फ तुम


ये थका थका सा क्या है।यह घने कोहरे में कौन है जो दूर से भी नज़र आ रहा है।वोह कौन है जो लिहाफ को भी छोड़ने को मजबूर कर रहा है।वोह क्या है जो ठण्ड से ठिठुरते बदन को थाम लेना चाहता है।वोह क्या है जो दिसम्बर की बहकती कलम को पकड़ कर सीधा कर देता है।
आखिर वोह कौन है जो दहकती आग को हरा सकता है।वोह जमती बर्फ़ को भी पिघला सकता है।बारिश में जिसका सुरूर सर चढ़कर बोलता हो।मैं सोचता हूँ वोह कौन है जिसके कन्धों पर मैं ज़बरदस्त गम में फफक फफक कर रोया।आखिर वोह कौन है जिसके गले लग कर मैं खुशियों में आसमान तक जा पहुँचा।वोह कौन है जिसने मुझे अवसाद के छणों में शून्य के साथ,शून्य बनकर सहारा दिया।
यक़ीनन,वोह मेरी अपनी,मेरी प्यारी,मेरी रूह,मेरे साथ हमेशा रहने वाली एक कप चाय है।वोह मेरी महबूब चाय।वोह मेरी दिलकश चाय।वोह मेरा सुरूर चाय।वोह मेरी खूबसूरत चाय।
आज जब नए काले मग में तुम इठलाती हुई कोहरे की शाल ओढ़कर,ब्रेड पर पाँव रखकर मेरे सामने आई तो जी चाहा तुम्हे लपक कर थाम लूँ।होंटो से लगा कर क़तरा क़तरा तुम्हे अपना बना लूँ।जब तुम आती हो तो खूब लिखने का दिल होता है।मगर सुन लो,कल से काले कप में मत आना,वरना तुम्हारे सिवा किसपर यह कलम चलेगी।मेरे दिल के सबसे करीब चाय,तुम ही हो,सिर्फ तुम।

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