ठण्ड में बरसात की रात वह बाहर खड़े रहे।खुले आसमान में वह एक झलक के लिए उसके दरवाज़े पर भीगते ठिठरते रहे।पैर हाथ की उंगलिया कपो कर सिकुड़ गई।मगर उनकी महबूबा ने दरवाज़ा तो दरवाज़ा खिड़की भी न खोली।आज़म शम्स सारी रात महबूबा की झलक में तड़पते रहे।उसका नाम पुकारते रहे।सुबह के चार बज गए।अचानक आसमान की तरफ देखा और चीखकर वह चौखट छोड़ दी।शम्स के दिल ने कहा की जिस मोहब्बत के लिए इतनी तड़प है उससे बेहतर है अपने ख़ुदा से मोहब्बत करूँ।एक झटके में सब कुछ छोड़ वह अपने महल लौट आए।
सब कुछ आम लोगो में बाँट दिया।रोज़ का नियम हो गया दिनभर काम और काम से मिले पैसो से हर ज़रूरतमंद को खाना खिलाना और ख़ुदा का ध्यान।साल के साल गुज़र गए।शम्स की महफ़िल इतना मशहूर हो गई की दूसरे शहर के गरीब गुरबा खाने के लिए आते रहे।एक दिन शम्स खुद खाना बाँट रहे थे की एक अधेड़ सी औरत आई और उसने शम्स का हाथ पकड़ लिया।बोली,मेरे महबूब उस रात आप मेरी झलक के लिए भीगते रहे,मुझे सब पता था मगर उस वक़्त शम्स तुम मेरे लायक न थे।एक रोज़ मुझे जब यह पता चला की इश्क़ ने तुममे सूफ़िज़्म का फूल खिला दिया तो मैं तुम्हारी मोहब्बत में तड़प उठी और भागकर देखो तुम्हारे पास आ गई।शम्स ने उस कई दिन की भूखी औरत को तख्त पर बैठाया और खूब खाना खिलाया।फिर कहा अब तुम जा सकती हो।तब पलट कर उसने कहा की मेरे आशिक क्या अब मैं तुम्हारे दिल में नहीं रही।क्या तू अब मुझे नही चाहता।पिछली सारी मोहब्बत भूल गया तू।तब शम्स ने कहा,मैं तुझे चाहता था।तुझे चाहने में मुझे लगा की मोहब्बत कितनी ताक़तवर होती है।तेरे चाहने से ही मेरे दिल में हर चीज़ के लिए मोहब्बत जाग उठी।तभी मुझे लगा की अब तुम्हे चाहता हूँ तो तुम्हे बनाने वाले को चाहा जाए जो तुम्हारे जैसे करोणों को बना चूका है और बना रहा है।एक वह दिन था एक आजका दिन है तब मैं अकेला मोहब्बत करता था।आज सारा बसरा शहर मुझसे मोहब्बत करता है।कल तक शम्स तुम्हारे एक दिल में जगह चाहता था।आज यह शम्स बसरा की हर गली के दिल में है।
तुम भी उठो और ख़ुदा के बनाए हर इंसान से मोहब्बत कर लो।यक़ीनन तुम इस शम्स को भूल जाओगी।वह जाने लगी तो शम्स ने पुकार कर कहा,उस सर्द रात तुम्हारे दरवाज़े एक आशिक खड़ा था जो वहीं मर गया।उस सुबह एक दरवेश पैदा हो गया और दरवेश किसी एक की मोहब्बत में हो जाए तो काहे का दरवेश।अब शम्स का दिल बसरा की तरह है।हर एक को अपनाने,सम्भालने और बढ़ाने के लिए।एक सूफी दिलों की आहट सुन लेता है।उसे दिलों की नज़ाकत को पालना होगा।सूफ़ी दिलों में मोहब्बत भरते हैं।ज़माने में इश्क़ घोलते हैं।दिल की धड़कन सुनकर दर्द पर हाथ रखते हैं।ज़ख्म पर ठंडे फाहे रखकर सुकून देते हैं।तुम जाओ और दुनिया के हर इंसान को शम्स समझ कर मोहब्बत करो।तुमके हर एक मे मैं नज़र आऊँगा।जाओ और ज़मीन को अपनी बची हुई मोहब्बत से भर दो।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Thursday, August 4, 2016
सूफ़ी शम्स
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