आह
कितना वक़्त गुज़र गया
वक़्त नही सदियाँ
तुम्हे न देखना
सदी ही तो है
तुम मेरी पहली
मुस्कान थे
वह हल्के हल्के
हँसता चेहरा
वह खुद में सिमटा जिस्म
वह संकोच में झपकती आँखे
कैसे याद करूँ अमित
बोलो अमित
अब तो तुम
बड़े मज़बूत
बड़े मर्द
हाँ मर्द
हो गए होगे
तुम्हारे आसपास
एक जमावड़ा
होगा
जिसमे सब मज़बूत
अमीर लोग होंगे
मेरा क्या वजूद
मैं तो तुम्हे
अकेलेपन में छेड़ूँगा
जो तुम्हे मिलता नही
अमित सैकड़ो
नही लाखो करोणों
बाते हैं
मुझे तुमसे करनी हैं
तुम्हे पकड़ना है
तुम्हे करीब से महसूस करना है
तुम्हारी साँसों को
हाँ सांसो को देखना है
देखना है की इसमें
मैं कितना हूँ
हूँ भी
या नही
तुम पर
सिर्फ तुम पर
मेरा हक़ है
बोलो न
चीखकर कह दो
अमित
अमिट समय तक
मेरा तुमपर हक़ है
आज तुम
मुझमे हो
शायद तुममे
मैं कहीं हूँ
अगर हुआ
मेरे लिए होना
सौभाग्य है दोस्त
हाँ दोस्त सौभाग्य
तुम सौभाग्य ही हो
हाँ तुम हो
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, August 7, 2016
अमित शुक्ला
Labels:
hafeezkidwai,
poetry
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