Saturday, August 20, 2016

बेच दें

प्लीज़ कोई तो इसको बिकवा दो।यह मेरी कलम है, जिसने खूब लिखा है।सब पर लिखा है।हर जगह,हर एक,हर मौजू पर लिखा है।मैं इस कलम को आज बेचना चाहता हूँ।यह लिखते लिखते इतनी बिगड़ चुकी है की यह अब मेरी भी नही सुनती।मैं देख रहा हूँ इसमें सियाही पूरी भरी है फिर भी यह लिख नही रही है।मेरी यह कलम खाई अघाई हुई है, तभी इसे कमज़ोर पर लिखकर ज़ाया नही होना है।मैं कलम से कहता हूँ की तुम कश्मीर के डेढ़ महीने के कर्फ्यू पर लिखो तो वह रुक जाती है।हमसे कहती है कश्मीर की खूबसूरत वादियों पर लिख दूँ।मैं झिड़क देता हूँ।फिर कहता हूँ महीनो से लापता AN32 विमान पर लिखो उसमे बेचारे 43 सैनिक लापता हैं तो कलम फिर रुक जाती है।कहती है स्वर्ग की सीढ़ी पर लिखूँ,मस्त लिखूंगी।मैं डाँट देता हूँ।मगर बेहिस कलम मेरा कहा रक लफ्ज़ नही लिखती।मैं कहता हूँ की चलो अच्छा आतंकवाद पर लिखो तो कलम कहती है इससे अच्छा मैटेरियल आई एस आई एस में है, वह लिख दूँ।मैं कहता हूँ सियाचीन में खड़े सैनिक की बर्फ़ से ढकी टांग में ठण्ड से फूटी एड़ियो पर लिखो तो वह कहती है,यह मज़ेदार नही है।मैं कहता हूँ की बलात्कार के बाद औंधी पड़ी उस लड़की की सिसकिया लिखो तो वह कहती है की लड़की का पास्ट लिखूँ।मैं चाहता था की पैलेट गन से छलनी चेहरों को लिखूँ तो वह कहती है सेब और ज़ाफ़रान पर लिखूँ।मैं बेरोज़गारी और महँगाई पर चाहता था मेरी कलम चले,मगर वह कहती है की बढ़ती हुई जीडीपी पर लिखूँ।मैं कहता हूँ कट्टरपंथ पर लिखो तो वह कहती है जाओ और जितनी चाहे कोशिश करलो।मैं नही लिखूंगी।मेरी कलम मेरे बस से बाहर हो गई है।इसे बेच देना बेहतर है।कोई इसे खरीद ले ताकि इसे सही दिशा मिल सके।यह मेरी तरह अपनी मर्ज़ी की मालिक हो गई है।इसलिए दो आज़ाद ख्याल लोग एक जगह नही रह सकते।तुम दूर हमसे,बहुत दूर चली जाओ।वैसे बिकने से पहले एक सच तुम्हे ज़रूर बता दूँ,तुममे मेरा ही ख़ून है।जहाँ जाओगी वहाँ आखिर कब तक दुनिया की भीड़ को देख कर लिखोगी।एक न एक दिन तुम चाहोगी सच लिखना।जब तुम्हारे अंदर सच को सच कहने,ज़ुल्म को ज़ुल्म कहने,झूठ को झूठ कहने की पुरानी सलाहियत आ जाएगी तब तुम कहीं भी होगी मैं लपक कर तुम्हे अपना लूँगा।इस दोराहे पर हम और तुम साथ नही चल सकता।जब तक मैं जूझता हूँ तब तक तुम प्रेमगीत लिखो।चलो कुछ वक़्त के लिए हम अलग हो जाए।©

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