उठते ही पहली फ़िक्र थी की आज यह पूरा पहाड़ पार कर लूँगा।जम्मू से वादियों की दूरी लम्बी थी।किस्से तमाम तरह के थे।भूख तो लगी थी मगर जाने की जल्दी में खाना छोड़ दिया।अकेले का डर ऊपर कश्मीर की तरह तरह की कहानियाँ।पहले भी गया था मगर तब दसयों साथी थे।बातचीत में न रास्ता देखा न कोई फ़िक्र,मगर अब डर था।पहाड़ खूबसूरत तो लग रहे थे मगर डरा रहे थे।सब भीगा भीगा था इतना भीगा की मेरा माथा भी भीग सा रहा था।ढेर भर इलाईची भी थी मगर खाई नही जा रही थी।थोड़ी थोड़ी दूर पर लगे चेकपोस्ट पहले से डरे लड़के को और डरा रहे थे।एक तरफ गाड़ी में बैठे अनजाने लोग दूसरी तरफ यह रौबदार रंगरूट।मन में था काश कोई जानने वाला मिल जाए।तभी पाँच घण्टे के बाद गाड़ी एक जगह रुकी थी।हल्की बदली में रौशनी धूँधली हो गई थी की अचानक तुम दिख गई।तुम्हे देखते ही लगने लगा की वाक़ई ख़ुदा है।तुम्हारे होने से मैं चहक उठा।मुझे वादियाँ खूबसूरत लगने लगी।तुम्हे देखते ही लगा की वाक़ई इकलौती तुम ही तो हो जो मेरे हर बुरे वक़्त पर मिलीं।जैसे ही तुमने बढ़कर मुझे छुआ मेरी रूह खिल गई।एक हिम्मत सी आ गई।जैसे ही तुम मेरे होंटो से आ लगीं मेरी दुनिया मुझे यहाँ दूर वादियों में मिल गई।रास्ते से ठंडे हुए बदन ने हल्की सी गर्मी के एहसास को जिया।अब सारे अजनबी लोग दोस्त लगने लगे।रंगरूटों की खूबसूरत मुस्कान AK47 पर भारी पड़गई।तुम्हारे होने से ही खूबसूरती निखर आई।मुझे लगा की वाक़ई मैं तुम्हारी मोहब्बत से कुछ वक़्त के लिए ख़ाली थातभी यह मायूसी आई।सुन लो।हाँ सुन लो मेरी चाय,तुम्हारे बगैर मैं ऐसा ही हो जाता हूँ।मेरी हाँ सिर्फ मेरी चाय,तुम यूँ इतनी देर दूर मत रहा करो।आओ हम तुम एक हो जाएँ।या तो तुम मुझे पी लो या तो मैं तुम्हे।मेरी चाय सिर्फ तुम ही तो हो मेरी रूह।मेरी हिम्मत।मेरा हौसला। तुम्हारा गाढ़ा रँग मुझे कश्मीर से ज़्यादा खूबसूरत लगने लगा है उस दिन से।चलो देर हो गई काफी।आओ,अब देर मत करो मेरा सबकुछ,मेरी चाय..... ©
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