अगस्त क्राँति की तब की तरह आज भी ज़रूरत है।
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हफ़ीज़ क़िदवई
....हमेशा ज़ुल्म के लम्बे दौर के बाद एक वक़्त आता है जब कमज़ोर से कमज़ोर जीव ताक़तवर हो जाता है।वह दर्द के पार जाकर दर्द को हराकर ज़ुल्म के मुकाबले खड़ा हो जाता है।हम यहाँ लीडरशिप की बात नही कर रहें।यहाँ बात उस आम से लोगो की है जो जल्दी जल्दी विरोध में खड़े नही होते।जिनमे लम्बे ज़ुल्म की वजह से लड़ाई न लड़ पाने की कई वजह बैठ जाती हैं।जो देश या संस्कृति के संघर्ष से पहले भूख के लिए लड़ता है।जिसकी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा एक वक़्त के खाने के लिए खर्च हो जाता है।यह वह जीवट लोग होते हैं जो रोज़ ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष करते हैं।मगर हाँ मगर जब यह लोग किसी मुद्दे के लिए बाहर आ गए तो ज़ुल्मी को हारना ही होता है।
बात अगस्त क्राँति की कर रहा हूँ।हम हमेशा ऊपर के नेतृत्व तक सिमट कर क्रांतियों की चर्चा करते हैं।बड़े नामवर नेताओ के इर्द गिर्द हमारी चर्चाए होकर खत्म हो जाती हैं।अगस्त क्राँति को समझना हो तो उसमे कूदे हर जनमानस के मन को टटोलना होगा।महात्मा गाँधी ने अपने लगातार प्रयत्न से इस क्राँति में उस वर्ग को बाहर ला दिया जो स्वयं अपने ही जीवन से रोज़ संघर्ष कर रहा था।वैसे नौ अगस्त 1942 से क्राँति का आरम्भ माना जाता रहा है मगर उससे पहले ही बहुत से काँग्रेसी नेताओ को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया।यह वह नेता थे जिनके निकलने भर से गरीब अमीर सब घर छोड़ देते।इनकी घर के चूल्हो में पैठ थी।इसलिए इनकी गिरफ्तारी पहले ही हो गई।बम्बई के अधिवेशन में जब गाँधी जी ने भारत छोड़ो का उद्घोष किया तो वहीं से गिरफ्तारियां शुरू हो गई।उत्तर प्रदेश से गया प्रतिनिधि मण्डल गिरफ्तार हो गया।सभी बड़े लीडर जेल में थे ऐसे में वही वर्ग सड़क पर आ गया जो बेहद कमज़ोर था।शहर शहर गाँव गाँव से लोग निकलने लगे।पता नही वह कौन सा जादू था की देश ने भूख पर विजय पा ली और आगे बढ़कर अंग्रेज़ों भारत छोड़ो के नारे को थाम वह कूद पड़े।
करो या मरो,उन्हें लगने लगा की वाक़ई अब आगे बढ़ना ही होगा।बिरतानियो को निकालने के अलावा कोई सूरत नज़र नही आती थी।ज़ुल्म से आम से आम इंसान इतना आजिज़ था की उसने इसका विरोध ही अपना पहला काम बना लिया।करो या मरो ने घर घर में जगह बना ली।इतने बड़े आंदोलन को हिन्दू महासभा,कम्युनिस्टों और लीगियों ने समर्थन नही दिया फिर भी यह जन जन तक पहुँच कर अंग्रेज़ों को परेशान करने लगा।
अगस्त क्राँति का एक जो पहलू ज़मीनी था तो वहीं दूसरा वैश्विक भी था।भारत के कड़े विरोध और इतने मज़बूत नारे ने दुनियाँ को अपनी तरफ खींचा।गाँधी को विश्व युद्ध के दौरान विश्व ने गाँधी की नज़र से देखना शुरू किया।यह आंदोलन विश्व पटल पर बड़ा उदाहरण बना जिससे अँगरेज़ बड़े घबराकर इसे दबाने लगे।दमन का वह चक्र चला की हर तरफ गोलियाँ चलने लगी।बहुत से आंदोलनकारी शहीद हो गए।कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व जेलों में ठूँस दिया गया।अब यहाँ एक बात गौर करने वाली है की जब यह आंदोलन चला तो काँग्रेस तो पूरी जेल चली गई।राज्यो में कांग्रेस के सभी बड़े लीडर जेल में थे।उत्तर प्रदेश का बड़ा छोटा सभी कार्यकर्ता जेल में थे या छुपे हुए थे ऐसे में मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा को अपनी बढ़त के अवसर दिखने लगे।यह काँग्रेस के कमज़ोर होने का तो इंतज़ार कर ही रहे थे।अँगरेज़ सरकार ने इन्हें बड़ा मौका दे दिया।कांग्रेस के सारे करिश्माई नेता जेल में थे ऐसे में इन दोनों संगठनो ने अपनी कार्यवाहियां तेज़ कर दी।काँग्रेस के विरुद्ध अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए इनके नेताओ ने दौरे तेज़ कर दिया।इस आंदोलन की सबसे कमज़ोर कड़ी यही थी।यहीं से साम्प्रदायिकता को वह खाद रसद मिली की उसका परिमाण भयावह हुआ।कांग्रेस के सभी लीडर इस स्थिति के लिए बेचैन थे मगर उनपर इतनी सख्ती थी की उनका एक शब्द भी बाहर नही जा पा रहा था।
हाँ तो इस नाज़ुक मौके को भी देखिये दोनों संगठनो ने खूब मेहनत की मगर देश की जनता ने इन्हें नकार दिया।अवाम ने जेलों में बन्द अपने नेताओ को ही अपनाया और इस बीच होने वाले चुनाव में इन दोनों दलो को काँग्रेस के मुकाबले हरा दिया।अगर हम भारत छोड़ो आंदोलन को उत्तर प्रदेश की नज़र से देखें तो काफी कुछ साफ़ हो जाता है।आंदोलन से पहले ही यहाँ के काफी लीडर जेल चले गए थे।कुछ कांग्रेसियो के तो इतने बुरे हाल थे की उनके घरों के चूल्हे बुझ गए।तब जेल से रफ़ी अहमद क़िदवई इन घरों में आर्थिक मदद भिजवाते ताकि संघर्ष कमज़ोर न होने पाए।उत्तर प्रदेश में कमज़ोर तबक़े ने मज़बूती से संघर्ष को थामा इसलिए यह ज़रूरी था की उन्हें पारिवारिक कामो में कमज़ोर न होने दिया जाए।बम्बई से निकला यह आंदोलन पूरे देश में एक साथ बढ़ गया।
आजके नौजवान को यह ज़रूर मालूम होना चाहिए की यह आज़ाद मुल्क़ किस किस की मेहनत का हिस्सा है।उन घरों को हम कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं जो अपना सब कुछ मिटाकर इसमें कूद पड़े।किसी को नही पता था की वह जेल से निकलेंगे भी या नही।वह जीवन के दूसरे छण जी भी पाएँगे या नही।बस एक ज़िद थी करो या मरो।
अगस्त क्राँति की बड़ी कामयाबी थी की यह गाँव गाँव कूचे कूचे से निकल रही थी।एक और जहाँ अरुणा आसफ अली जैसी महिलाए छुप छुप कर इसे मज़बूत कर रही टीही वहीं गाँव की साधारण औरते अँगरेज़ सैनिको के सामने खड़ी थीं।यह आंदोलन पूरी तरह से व्यवस्था के विरुद्ध था,जिसमे जन सहभागिता ने ऊर्जा भर दी थी।अँगरेज़ एक और विश्वयुद्ध में थे तो दूसरी ओर भारत में ज़बरदस्त विरोध झेल रहे थे।इससे खीजकर वह इतने बर्बर हो गए की क्या औरत क्या आदमी,बच्चों तक को बख्शा नही गया।यह हिंसात्मक दमन ने आग में घी का काम किया।पहले कांग्रेस के लीडर लड़ते थे मगर इस आंदोलन ने उन लीडर के रिश्तेदारो,नातेदारों,दोस्तों जानने वालो को भी प्रेरित किया आंदोलन में कूदने के लिए।यही वह वक़्त था जब यह तय हो रहा था की भारत का भविष्य क्या होने वाला है।महात्मा गाँधी का नेतृत्व सब पर भारी पड़ता गया और उनकी छाप आम जनता के दिलों पर छप गई।नेहरू का पूरा परिवार जेल में था,देश की जनता ने उनके नेतृत्व पर विश्वास जताया।
एक तरफ देश के चोटी के नेता जेल में थे तो दूसरी तरफ आम जनता सड़क पर थी।मैं परिवार के उस हिस्से को ज़रूर बताना चाहूँगा जब रफ़ी अहमद क़िदवई जेल गए तो उनकी पहली फ़िक्र थी आज़ादी के सिपाहियो के घर की स्थिति।रफ़ी अहमद क़िदवई चन्दा जुटाने में बड़ी महारथ रखते थे।जब कांग्रेसी नेताओ पर ज़ुल्म बढ़ने लगा और उनके परिवार को तोड़ा जाने लगा तब रफ़ी अहमद क़िदवई का नेतृत्व काम आया।उन्होंने परिवार के लोगो को जेल में बुलाकर अपने छोटे से छोटे कार्यकर्ता का नाम पता दिया और सख्त हिदायत दी की उनके घरों में चूल्हे बुझने नही चाहिए।उनके कहे का असर की आम लोग बीही इनके घरों में खाना पानी लेकर पहुँचने लगे।यह बड़ा रोमांचक छण होता है की जब आप जेल में हो और कोई अंजान आपके परिवार को अपना समझ सेवा करे।ऐसे मैं वह आपके परिवार के साथ साथ संघर्ष में बराबर का साथी बन रहा होता है।अगस्त क्राँति ने ऐसे हज़ारों क्रान्तिकारियो को पैदा कर दिया जो छुपकर,बचकर मदद को खड़े हो रहे थे।उत्तर प्रदेश से निकला यह मॉडल देशभर में बढ़ता गया।अगस्त क्राँति ने हमारी मुलभूत संरचना को भी खूब सींचा।हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग अथक मेहनत के बावजूद काँग्रेस की जगह नही ले पाई।जबकि इन्हें सरकार से सहयोग नही मिलता रहा मगर देश की जनता ने देश के लिए संघर्ष करने वालो को चुना।मैं इसीलिए कह रहा हूँ की अगस्त क्राँति ने बहुत हद तक भारत के चेहरे की कल्पना को मूर्त रूप दे दिया था।कम्युनिस्टों ने इस आंदोलन से खुद को अलग करके उसी वक़्त आमजन से अपने रिश्ते पर चोट ले ली थी।समाजवादियो और कांग्रेसियो ने पूरे आंदोलन में बढ़ चढ़ कर घर घर में जगह कर ली।इस आंदोलन ने हमारी प्राथमिकताएँ भी तय कर दीं।
वैसे भारत को समझना हो तो उसके ग्रामीण अंचल को समझये।अगर आंदोलन की कामयाबी समझनी हो तो गाँव में झाँक कर देखिये।अगर आंदोलन गाँव में आ गया तो समझये उसको वह ताक़त मिल गई जिसे कोई कमज़ोर नही कर सकता।अगस्त क्राँति गाँवो में ऐसी पहुंची की ब्रिटिश हुकूमत के पास गाँव की निगरानी के लिए सिपाही कम पड़ गए।कुछ लोगो को लालच देकर वैकल्पिक पुलिस की व्यवस्था भी की जाने लगी।बाराबंकी के तो बहुत से किसानो ने अपने अनाज को जेल में बन्द नेताओ के घरों में पहुँचाना शुरू कर दिया।किसानो और मज़दूरों के इस कदम ने अंग्रेज़ों को बेहाल कर दिया।बहुत से किसान इनकी गोलियों से शहीद हुए।अगस्त क्राँति में हर वर्ग ने हिस्सा लिया।उन्होंने उस नारे को ज़िन्दगी बना लिया करो या मरो।
बहुत बार बहुत सारा कुछ आंदोलन पर लिखा जा चुका है।समाजवाद,गांधीवाद पर महीन से महीन कलम चल।चुकी है।अगस्त क्राँति के बाद देश की आज़ादी और बटवारे को देश ने देखा है।अपने करिश्माई वैश्विक लीडर महात्मा की शहादत को बर्दाश्त किया है।वह पूरा एक दौर निकल चुका है।हम अब आज में जी रहे हैं।मैं बहुत सी बातों, नामों,विचारो को लिख सकता था मगर मेरे लिए वह नब्ज़ ज़रूरी थी जो मैं पकड़ना चाह रहा था।आंदोलन का शुरू होना,उसका बढ़ना,जन जन तक जाना,संघर्ष और परिणाम।इसको समझना ज़रूरी है।यह देखना ज़रूरी है की आम सहभागिता कैसे बढ़े।अगस्त क्राँति में इन सब सवालो के उत्तर निहित हैं।अब आप आगे बढ़िए और इस नारे को फिर से थाम लीजिये।अब हमे अंग्रेज़ों भारत छोड़ो ने कहना हैं।अब हम गरीबी भारत छोड़ो,नफ़रत भारत छोड़ो,साम्प्रदायिकता भारत छोड़ो,जातिवाद भारत छोड़ो,नशा भारत छोड़ो,अशिक्षा भारत छोड़ो,महिला हिँसा,बाल हिँसा,घरेलू हिँसा भारत छोड़ो,गैर बराबरी,असमानता,अमानवता,हिँसा,दहेज,भृष्टाचार,साम्प्रदायिकता भारत छोड़ो का आंदोलन चलाना चाहिए।यह सब तब सम्भव होगा जब हमे संघर्ष का रास्ता मज़बूती से थामना आ जाए।हममे हर स्तर की लीडरशिप बढ़ानी होगी।जो मज़बूती से इससे लड़ सके।अगस्त क्राँति के बाद फिर एक अगस्त क्राँति की ज़रूरत है।ईमानदारी से अगर इनमे से किसी एक में भी सही नेतृत्व पैदा हो जाए तो यक़ीनन वह खत्म हो जाएगा।हमारे पास गाँधी, नेहरू,लोहिया,अम्बेडकर,रफ़ी अहमद क़िदवई,नरेंद्र देव,आचार्य। कृपलानी,जेपी जैसे संगठनकर्ता और लीडर हैं।जिनके काम को देख कर हम अपने रस्ते तय कर सकते हैं।जब हम दिल से ईमानदार होंगे तो हमारी आवाज़ें हर दिल में पहुँचेंगी।यह भारतभूमि है, इसने हर संघर्ष को समय दिया है तो हमे भी कल के भारत को बनाने में आज मेहनत करनी ही होगी।अब इतिहास को देखकर आगे का रास्ता बनाना होगा नाकी इतिहास की खूबियों पर बात करके वक़्त काटना।मैं तभी अगस्त क्राँति की बहुत सी ऐतिहासिक चीज़ों से किनारा करके सिर्फ यह दिखाना चाहता हूँ की यह कहाँ तक पहुँचा था।भारत का भविष्य अगस्त क्राँति के रास्ते से ही जाएगा।इसलिए इसकी व्यापकता पर पैनी नज़र रखकर आजकी दिशा तय करनी होगी।
हमे हर बुराई को खत्म करने के लिए गाँव गाँव मेहनत करनी होगी।उनको संघर्ष का रास्ता और जूझने की ऊर्जा देनी होगी।उन संघरशील नेताओ को सहारा देना होगा जो अकेले पड़ गए हैं।कोई आए या न आए हमे खुद एक बुराई को चुनकर।उसे खत्म करने के लिए करो या मरो का रास्ता अपनाना होगा।आज युवा बेहद समझदारी से अपना भविष्य तय कर रहा है।उसे देश के निर्माण और संवारने में लगाना सम्भव है बशर्ते सही नियत से लीडरशिप आगे ए।तो अंत में बस यह की अगस्त क्राँति को अब देश आज़ाद हो जाने,अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद फिर से शुरू करना है।हमे वह भारत बनाना है जो अबको खुशियो के मौके दे।जो भेद को मिटा दे।आइये आज प्रण ले की अपनी आज़ादी के नायकों के ख्वाबो को पूरा करेंगे।नफ़रत पर हमारा प्रेम भारी पड़जाएगा।आतंकवाद,हिँसा,सम्प्रदायिकता हमारे प्रयासों से हार जाएगी।उठिये और अगस्त क्राँति की 75वीं वर्षगांठ को सलाम करके इसे आगे बढ़ाइए।हम सब भारतीयो का कर्तव्य है भारत को सुंदर,सशक्त,विकसित बनाना।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, August 8, 2016
अगस्त क्राँति
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Good articles.
ReplyDeleteWell done.