मेरे लिए तुम क्या थे
एक नाम,एक सहारा
वक़्त काटने की
वजह
नही नही
हरगिज़ नही
मेरे लिए तुम थे
एक वजह
मेरे होने की वजह
मेरे हँसने की वजह
मेरे बढ़ने की वजह
एक रोज़ हम बड़े हो गए
खत्म हो गई वजहें
तुम दूर निकल गए
मैं वही
हाँ वही
तुम्हे जाता देखता रहा
तुम दूर निकल गए
इतनी दूर की जिस्म
धुन्धला गया
मगर
तुम अब भी हो
वैसे ही
माथे पर तिलक लगाए
मुस्कुराते हुए
विश्वास से भरे
मेरे सामने
मेरे साथ
मेरे अंदर
मुझमे
मेरे दोस्त
विशाल तुम यहीं हो
हाँ यही
मुझमे
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, August 7, 2016
विशाल पाण्डेय
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hafeezkidwai,
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