Wednesday, August 10, 2016

तमाशा

हाँ मानता हूँ मेरे यह लफ्ज़ बुरे हैं, उदाहरण तकलीफ़देह है मगर क्या करूँ,अगर बर्दाश्त हो सके तो पढ़िए ........सुन सको तो सुनों हम सबकी हालत एक वैश्या जैसी हो गई है।जैसे वह रोज़ बिस्तर पर हर दूसरे के संग आवाज़ें निकालती है।उसे एहसास कराती है की मैं आज ही पहली बार सिर्फ उसके साथ लेटी हूँ।जबकि उसको अच्छे से पता है बिस्तर और लोग बदलते रहेंगे उसका काम तो एक है।उसका एहसास सुन्न हो चुका है।उसे फ़र्क नही पड़ता की क्या हो रहा।उसे सिर्फ पैसों के लिए अपने नए पन का एहसास करवाते हुए आवाज़ें निकालनी ही निकालनी हैं।उसी तरह हमारे भी एहसास सुन्न हो चुके हैं।जब कुछ बुरा होता है तो अफसोस लिख देते हैं।मोमबत्ती लेकर खड़े हो जाते हैं।दुआओं में भी यही हाल है बस रोज़ खड़े होकर माँगते रहते है।दुआ,प्रार्थना,पार्टी,जुलुस सब जगह सिर्फ हम एक आवाज़ निकालते हैं जिससे लोगों को एहसास हो की हम हैं।संघर्ष है।जैसे वैश्या एहसास दिलाती है।ज़रा भी सच्चाई हो दर्द में तो सिर्फ़ तमाशे न हों।काम हो।दिल से काम हो।जब दिल में कुछ उलझन होती है तो दुनिया उसे महसूस करती है, जुड़ती है और साथ चलती है।आज जो आपकी आवाज़ों की तासीर ख़राब हो गई उसकी वजह ही है की आपने सिर्फ लड़ाई प्रतीकों में लड़ी है।हम महँगाई, भृष्टाचार,अत्याचार,साम्प्रदायिकता,गरीबी,बेरोज़गारी,सूखा, किसान सबके लिए बस एक आवाज़ ही उठाते आए हैं।वैचारिक जूझना तो हममे है ही नही।घर से निकल कर लड़ना,लोगों के साथ खड़े होना भूखे प्यासे बिना तमाशे के हमे अब नही भाता।विचारों की तो बात ही नहीं।विचार के लिए तो सिर्फ दो ही रास्ते हैं या तो बढ़ जाना या तो मर जाना।तीसरा विकल्प विचार के लिए नही है।अपनी आवाज़ में सच्चाई,वज़न और मोहब्बत लाइए ताकि एक अच्छा कदम फ़रेब न लगे।जिन्हें भी अल्पसंख्यको,बहुसंख्यको,पिछड़ो,दलितों,महिलाओं या किसी  के लिए वाक़ई कुछ करना है, मुल्क की ज़रा भी मोहब्बत है वह निकले तब तक निकले जब तक या तो दिक्कत खत्म न हो जाए या वो खुद।वैसे यह कठिन रास्ता है बेहद कठिन, आसान है बिस्तर पर पड़े आवाज़ निकालना।अपना रास्ता खुद चुनें।जिन्हें कड़वी लगें यह बातें उन्हें लगें।आप मुझे जीभर कोस लीजिये मगर एक बार अपना गिरेहबान झाँक कर देखिये की आप दर्द के लिए कितना लड़े हैं।कैसे लड़े हैं।कब तक लड़े हैं या सिर्फ लड़ने के लिए लड़े हैं।©

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