तुम भूल गए
शायद भूल ही गए
वह जब
तुम्हे देख मैं
मुस्कुराया था
वह मेरी मुस्कान
बड़े अरसे बाद आई थी
तुम थे वजह
तुम्हारी वह आँखे
वजह थीं
तुम्हारा होना
वजह था
कितनी दूर हम यूँही
चलते रहे
मुस्कुराते
वह डायरी
हाँ वह डायरी याद करो
जिसमे तुमने लिखा था
कुछ तो लिखा था
जो मैं बोल रहा था
तुम मेरे लफ़्ज़ों को
समेट रहे थे
मैं तुम्हारे सवालो को
महसूस कर रहा था
वह बड़ा बरगद का पेड़
हाँ वही छतरमंज़िल वाला
तुममे मैं देख रहा था
खुद को
हाँ मैंने देखा था
धूप में तुममे
अपने आपको।
वह पहला रिश्ता
बिना चाय के
इतना बढ़ गया था
आज बेहद दूर हो
नही शहर में नही
मेरी पहुँच के दूर
मैं तुम्हे पकड़ना चाहता हूँ
हँसना चाहता हूँ
वह अधूरी चाय पीना है मुझे
तुम्हारें नाम को
हाँ अम्बुज को
नही नीरज अम्बुज को
चाय के साथ सहेजना है
मुझे तुम्हे सहेजना है
दोस्त
मुझे खुद को
तुममे
या मुझमे
या कहीं भी
सहेजना है दोस्त।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, August 7, 2016
नीरज अम्बुज
Labels:
hafeezkidwai,
poem
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