Monday, August 29, 2016

आशिकी दशम्

कितनी तक़लीफ़ थी,जब मैंने हॉस्पिटल का रुख किया था।डॉक्टर ने एडमिट कर लिया।दर्द के साथ यहाँ बेड पर पड़े रहना ज़ुल्म था।मैं लाख कोशिश करता रहा की एडमिट न होऊ मगर मेरी एक न चली।सिर्फ तीन दिन के लिए रुकने को कहा मगर हमे यह जेल लग रहा था।किस परेशानी से वोह रात कटी।सुबह तुम्हे देखा।तुम्हारे गोरे हाथों में इंजेक्शन देखा।कसम से इंजेक्शन से भाग जाने वाला मैं तुम्हे देखता रहा और तुम आहिस्ता आहिस्ता इंजेक्शन के सहारे मुझमे दाखिल हो गई।हमे भी लगा चलो अस्पताल के मुर्दा माहौल में तुम्हारी मुस्कान हमे ज़िंदा रखेगी।तुम तरह तरह के बहाने से मेरे बेड तक आती रही और मैं तुम्हारे क़रीब।डॉक्टर ने कहा आप तो जल्दी ठीक हो रहें कल डिस्चार्ज कर देंगे,मायूसी ने हमे घेर लिया।लटके हुए मुँह से कहा की डॉक्टर साहब इतना ठीक करदो की दोबारा न आना पड़े भले पन्द्रह दिन रोक लो।डॉक्टर मुस्कुराए और निकल गए।तुमसे दिलकश बातों का दौर चलता।दूसरे मरीज़ जलते थे।वो बगल के रूम वाले बुड्ढे मरीज़ से तुम भी तो छुप कर यहाँ आती थी।वोह बड़बड़ाते रहते और तुम मुस्कुराती।तुम अक्सर उस सामने वाली मरीज़ को नींद की दवा दे देती थीं,जो तुम्हे मेरे पास देखते ही बार बार बुलाता था।तुम्हारी बातों कभी मुकम्मल नही हुई।हफ्तेभर के बाद डिस्चार्ज होकर मैं घर लौट आया।अस्पताल के बाद तुम से कोई बात नही।तफ़रीह समझ सब भूलकर मैं अपने कामो में लग गया और तुम अपने।मुझे वोह आँधी की रात कभी नही भूलेगी जब तुम अपने शहर से साठ किलोमीटर दूर मेरे गाँव,मेरे दरवाज़े,भीगी हुई,दो बड़े सूटकेस लिए खड़ी थी।ज़मीदार और ईमाम की चौखट पर एक अधेड़ लड़की वोह भी रात में भीगी खड़ी थी,क्या यह किसी क़यामत से कम थी।अब्बा ने खड़े लहजे में पूछा था तुम कौन हो और तुमने उतने ही खड़े अंदाज़ में कहा था "आपके इकलौते चराग़ का तेल"।कसम से इतना बेहूदा जवाब अब्बा ने कभी नही सुना था।मारे शर्म के वोह अम्मी को आगे करके वज़ू करने चले गए।अम्मी सिर्फ तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखे और ज़रूरत से ज़्यादा खुल चुके होंट देख भौचक खड़ी देखती रहीं।तुम बेपरवाह  घर में दाखिल हुई और मेरे सीने पर सवार होकर तुमने कहा था "मियां क्या समझे थे,खेलोगो,कूदोगे और निकल लोगे।मैं फरा हूँ।अपना हक़ छीन कर लुंगी।मियाँ मोहब्बत लौंडो का खेल नही है।"
मैं कह नही सकता की वोह डर मैंने कभी दोबारा जिया।कनपटी के पास से निकली तुम्हारी भयंकर मोहब्बत से पीछा छुड़ाने की लम्बी दास्ताँ है।फ़िलहाल नर्स से मोहब्बत दोबारा नही हुई।तुम्हारे कदम ने सालों मुझे अब्बा  की आँखों से दूर रखा।अब भी कोई कहीं मुस्कुरा के देखता है तो तुम्हारे यह लफ्ज़ मुझे ख़ामोशी से निकल लेने को कहते हैं की.... मियाँ मोहब्बत लौंडो का खेल नही है। ©

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