Saturday, August 13, 2016

ईश्वर अल्लाह तेरौ नाम

यार यह बताओ यह जो तुम्हारा रेडियो है, यह मुझे देते जाओगे।यह रेडियो कबसे हम दोनों साथ में बैठे सुनते रहे हैं।भैंस चराते,धान रोपते,आम की बाग़ में,मोमफली के खेत में, कहाँ नही साथ सुना है रेडियो।गाँधी जी के हर बोल हमने तुमने साथ ही तो सुना है।यही रेडियो से सुनकर तुमने हाँ तुमने रफ़ीक उस दिन जोश में आकर हिंदुस्तान ज़िंदाबाद कहा था और तुम्हे उस शाम साठ बेत खाने की सज़ा एक मामूली अँगरेज़ ने दी थी।उन दिनों तुम्हारा यह रेडियो मैं ही तो बजाता था,तुम तो उठ भी नही पाते थे।अच्छा रफ़ीक तुम्हे याद है जब तुम्हारी विलायती पैंट को मैंने जला दिया था,जब इसी रेडियो पर गाँधी जी ने विदेश सामान के बहिष्कार को कहा था।तुम कच्छे में घर लौटे थे।तब तुम्हे देसी छड़ी से अनगिनत छड़ी पड़ी थी।हम दोनों कितने चालाक थे न,विदेशी सामानों में सब जला दिया सिवाए रेडियो के।पूरे गाँव में हम और तुम ही तो थे जो इस रेडियो से सबको बताते थे।हम तुम ही तो इस गाँव में गाँधी की ज़बान थे।तुम ,अब कुछ भी हो,यह रेडियो देते जाना।यह रेडियो हमारे साथ होने का सबूत है।मैं अभी भी यक़ीन नही कर पा रहा की तुम मनीष को छोड़कर पाकिस्तान जा रहे हो।तुम्हे मुझ मनीष पर नही,उतनी दूर बैठे क़ायदे आज़म पर यक़ीन है।यह रेडियो तुम छोड़ते जाओ रफ़ीक।इसमें हम अपने गाँधी को सुन पाएँगे।यह रेडियो हमे हमारी राह बताएगा।रफ़ीक,तुम्हे नही पता की मेरा दिल कितना चीरा जा रहा है।गाँव के बहुत से लोग तुम्हारी मुखालफत कर रहे हैं, फिर भी मैं तो हूँ।तुम्हारा मनीष।अच्छा आज की रात तक रुक जाओ न।हो सकता है हमारा गाँव भारत और पाकिस्तान के बीच में पड़ जाए।या यह भी हो सकता है हमारा गरीब खस्ताहाल गाँव इनमे से कोई न ले।तब तो हम साथ रह ही लेंगे।तुम आँखों में आँसू लिए मुस्कुरा रहे हो।तुम्हे लग रहा है की मनीष पागल हो गया है।हाँ,रफ़ीक मैं पागल हो गया हूँ।मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ है, एक बुज़ुर्ग को मारकर।बताओ मैं आने वाले के लिए खुश हों जाऊँ या जाने वाले के लिए गम करूँ।कुछ समझ नही आ रहा।रफ़ीक यह रेडियो यूँही मेरे पास छोड़ जाओ।मैं वह बापू की प्रार्थना सुनना चाहता हूँ,रघु पति राघव राजा राम...........इसे चलने दो तुम्हे कहीं जाने की ज़रूरत नही।हम और तुम ही हिंदुस्तान हैं।....ईश्वर अल्लाह तेरौ नाम.....। ©

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