तुमको देखता हूँ
रोज़ देखता हूँ
महसूस करता हूँ
तुम्हारी जीवटता
रास्ता दिखाती है
तृप्ति तुममे
हाँ तुममे
मैं माँ को देखता हूँ
भारत माँ को
मैं तुममे वह देखता हूँ
जो तुममे भीतर है
जो छिपा हुआ है
सरलता को देखता हूँ
तुम जब मुस्कुराती हो
तो एक विश्वास दीखता है
हाँ विश्वास
बिगड़े को सम्भालने का
टूटे को जोड़ने का
मिटते को बचाने का
हाँ विश्वास
तृप्ति तुम हो
हाँ तुम मेरा
विश्वास हो
ज़मीन पर रहने
खाने
मुस्कुराने
बढ़ने
का विश्वास हो
हिम्मत हो
तुम
हाँ तुम
पूरी एक वजह हो
हमारे मुस्कुराने की
हमारे जैसों के मुस्कुराने की
देश के मुस्कुराने की
तुम्हारा होना
ज़रूरी है
बेहद ज़रूरी है
तुम्हारा ऐसे ही होना
ज़रूरी है
तुम
मेरी ऊर्जा हो
मेरे खड़े होने की
ऊर्जा
मेरे हिम्मत से
खड़े होने की
ऊर्जा
तुम हम सबकी
ऊर्जा हो
तृप्ति
तुम ऊर्जा ही हो।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, August 7, 2016
तृप्ति श्रीवास्तव
Labels:
hafeezkidwai,
poetry
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