मैं झाँक कर तुम्हारी आँखों में देखता हूँ,तुममे मुझे हिन्दू दिखता है।मैं तुम्हारी आँख में आँख डालकर देखता हूँ,तुममे मुसलमान दिखता है।मैं हर कोण से देखता हूँ तुममे मुझे ईसाई,बौद्ध,जैन,सिख दिखता है।मैं सच बताऊँ लाख कोशिश करता हूँ।आँखों में गुलाबजल डालता हूँ ताकि साफ़ दिखने लगे।शहद भी लगा लेता हूँ ज़बरदस्त मिर्च के साथ फिर भी नही दिखता।तुममे मुझे किसी कोने से भारतीयता नही दिखती।तुममे हिंदुस्तान नही दिखता।
तुम चाहे जितने नारे लगा लो।चाहे जितनी आवाज़ बुलन्द कर लो।चाहे जितनो को भरी सड़क पर पीट लो।चाहे जिसके गिरेहबान फाड़ कर देशभक्ति को चेक कर लो,सच्चाई यह है की तुममे ही हिंदुस्तान नही है।तुम जब भी निकलोगे अपने धर्म की चादर ओढ़कर निकलोगे।तुम चाहे जैसे रँग चढ़ा लो,भारत तुम सा तो नही है।यक़ीन न हो तो सुबह उठना और दिल पर एक थर्मामीटर रखना।देखना दिल में कितनी गर्मी है।वह गर्मी धर्म की आड़ की है नाकी मुल्क़ की।
अपनी ज़बान से बेहिसाब गालियों को तौलना और देखना की क्या यही भारतीयता है या यह तुम्हारी निजी संस्कृति है।मैं यहाँ एक धर्म की बात नही कर रहा,मेरी फ़िक्र हज़ारों साल से,800 साल से,200 साल से,70 साल से हर एक के शासन को पूजने वालो से है की क्या वह कभी हिंदुस्तानी बनकर आज को जिएंगे।पुरखों को जो करना था वोह कर गए,तुममे कितना हिंदुस्तान बचा है यह बताओ।मैं जानना चाहता हूँ की देश की बात करते करते तुम कब धर्म का झण्डा थाम लेते हो।फिर चाहते हो की धर्म की आँख से देश देखा जाए।यह तो भरम है और कुछ भी नहीं।देशप्रेम की पहली सीढ़ी है उसमे बसने वाले हर नागरिक से अटूट प्रेम।जिसमे तुम सब बुरी तरह फेल हो जाते हो।आगे की सीढ़ियों का ज़िक्र ही क्यों करूँ।इतने बिखरे,बँटे और टूटे हुए लोग कभी भी मज़बूत इमारत की बुनियाद नही हो सकते।जाओ और खूब मीनारों से नारा ए तकबीर बुलंद करो।मन्दिरो से धर्म की जय जयकार करो।एक दूसरे धर्मो से भिड़ो।एक दूसरे को खत्म कर डालो।मगर इसे भारतीयता तो मत ही कहो।मेरे हर शब्द बुरे लगेंगे,लगने भी चाहिए।नासूर में जब औज़ार लगता है तो दर्द तो होती है।यह दर्द आपकी ज़बानों पर गाली भी लाएगा।दीजिये।मगर मैं लिखता रहूँगा।करता रहूँगा।या तो तुम्हारी नफ़रत का नासूर खत्म होगा या तो मैं।मैं आखरी साँस तक तुम्हारे बंटे हुए दिलों को रफ्फू करता रहूँगा।एक बार मुल्क़ के लिए सोचो।नफ़रत को दिलों से निकाल दो ताकि यह ज़मीन की भारतीयता बनी रहे।इतनी ज़िद,घमण्ड,झगड़े,फसाद,नफ़रत,बदले से तुम धर्म का झण्डा तो लहरा दोगे मगर भारतीयता की लाश पर।खुद सोच लो की करना क्या है। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Friday, August 26, 2016
नासूर
Labels:
hafeezkidwai
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment