चाय के साथ जैसे ही मोबाईल उठाया तो पहली नज़र fb पर गई।कुछ देर देखा।अलग अलग विचारों, तस्वीरों को देखा।फिर पोस्ट लिखकर डाल दिया।पोस्ट डालने के बाद fb से बाहर निकल वॉट्सऐप देखा।बहुत से मैसेज।कुछ के जवाब दिए,कुछ गोल।कोई अच्छा मैसेज लगा फॉरवर्ड कर दिया फिर वहाँ से भी बाहर।इतने में एनडीटीवी के एप ने पन्द्रह बीस खबरे भेज दी,वोह देखने लगे।उसी में एडिटोरियल बढ़िया आ गया,उसे पढ़ डाला।की तभी समंदर पार बैठे भाई का मैसेज आ गया तो उसे देखा।उनसे बात का सिलसिला शुरू हुआ।कुछ देर बाद वोह खत्म हुआ तो लगा अभी मेल तो चेक नही किया।फौरन मेल देखा।कुछ ज़रूरी का जवाब नही बाकि डिलीट।किसी ने अर्जेंट आर्टिकल माँगा तो उसके लिए अर्जेंट लिखने लगा।
लिखते में लगा यह तो हमे पूरा मालूम नही,चलो गूगल खोलते हैं।गूगल पर गए तबियत से ढूंढा पढ़ा,मगर मतलब का कम ही मिला।फौरन उस सब्जेक्ट की मौजूद ई-बुक ढूंढी गूगल प्ले स्टोर से,खरीदी,पढ़ डाली।फिर लिखना शुरू।किसी तरह चाय,नाश्ते के साथ यह सब चला की दूर के रिश्तेदार की वीडियो कॉल आ गई।बात चीत फिर शुरू।वोह खत्म हुई तो नज़र ब्लॉग पर गई।आज तो लिखा ही नही।लिखने से पहले लगा की fb चेक करले कुछ आया तो नही।fb के बाद दोबारा वाट्सएप फिर ब्लॉग।ब्लॉग लिखने के बीच पसन्दीदा ब्लॉग को पढ़ने का रुख।पढ़ने में किसी ने यूट्यूब वीडियो का बढ़िया रिव्यू लिखा,तो उसे ढूंढ कर देखने लगा।
इसके बाद बारी आती है ट्विटर की।बढ़िया सा ट्वीट किया और वहाँ से दफ़ा हुए।उतने में आई राईटर का मेल आ गया,उन्हें तीन आर्टिकल चाहिए।वोह लिखे की फ्रीलांसर एप ने बताया की फला बुक का रिव्यू चाहिए।वोह लिखा उसके बाद दूसरा मेल,उसी बीच फोन।फोन पर बात के बाद मैसेज।तो मैसेज के जवाब।बेड़ा ग़र्क हो हमारा।हमें यह समझ नही आ रहा की हम मोबाईल यूज़ कर रहे हैं या मोबाईल हमें।दूसरे सवाल करते हैं हर वक़्त मोबाईल हाथ में,उन्हें कौन बताए की इसमें हम क्या क्या कर आए हैं।कोई रिश्तेदारो से न मिलने का ताना दे रहा तो उन्हें कैसे बताए की समन्दर पार के भी रिश्ते निभा रहा हूँ।कोई पढ़ाई का ताना दे तो कैसे दिखाऊं की यही मोबाईल में सैकड़ों ई-बुक पड़ी हैं।चाय मोबाईल चाय मोबाईल चाय मोबाईल।बेड़ा ग़र्क़ है।
एक दिन आजिज़ आकर मोबाइल बैग में डाल दिया की आज नही छुएंगे।उसी दिन करीबी रिश्तेदार निकल गए।पूरा घर हैरान इत्तेला को।जब वोह कब्र में कीड़े मकौड़े से जा मिल बैठे तब हमने फोन देखा और अफ़सोस किया।कोशिश कर रहे हैं की दुनिया को देखें,टच स्क्रीन से नही,वाक़ई महसूस करके,बड़ी खूबसूरत है।पूरे का लब्बोलुआब यह है की यह जो कमबख्त स्मार्टफोन है न बड़ा स्मार्ट है।गुलाम बना लिया है कमबख्त ने,अरे बुरा न मानो अभी चार्जिंग पर लगा रहे हैं।ज़रा से कुछ कहो, सुर्ख़ होने लगते हैं।इनकी अदाओं में लिखने को बहुत कुछ रह गया है, इसलिए कम लिखे को बहुत बहुत बहुत ज़्यादा मानियेगा।ज़िन्दगी सिमट कर चाय के कप और स्मार्ट फोन में आ गई है।लोग कहते थे पैर चलते हैं, यहाँ तो उँगलियाँ सुबह सुबह कई किलोमीटर चल आती हैं।खैर इसमें बुराई भी क्या,सब कुछ एक जगह है,बढ़िया ही है।मज़े कीजिये। ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, August 30, 2016
मोबाईल
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