वह नीली गाड़ी
तुम्हारा अंगौछा
वह पुराने फोन
तुम्हारा उन फोन
से चिपका होना
बातें
इतनी बाते करना
की मैं उकता जाऊँ
देखो
अब तो मेरी तरफ देखो
मुझसे बात करो
हाँ मुझसे
मैं चाहता हूँ
तुम्हारी सुनना
तुम्हे समझना
अनुराग
मैं सब विषय को समझता हूँ
तुम हाँ तुम
मेरे लिए जटिल विषय हो
मेरे दिल में
सरलता से बैठा
जटिल विषय
तुम्हारा निरुद्देश्य
निःस्वार्थ
हर वक़्त
हर पहर
खड़े रहना
मुझे शरमा देता है
मैं खुद में छुप जाता हूँ
मैं तुम्हारे
समर्पण
त्याग
कर्म
में खुद को बौना पाता हूँ
तुम रहो
हाँ हमेशा साथ रहो
तुम्हारे होने से हम हैं
नही होने से
हम कुछ भी नही
अनुराग तुम
हाँ तुम
मेरी ताक़त हो
मेरे रहने तक
मेरे जाने के बाद तक
मेरे मिटने तक
तुम ऐसे ही
मज़बूत
खड़े रहो
तुममे जो है
जो चमक है
वह संसार को चमकाएगी
तुम बहुत ज़रूरी हो अनुराग
हाँ तुम हो
तो बहुत कुछ है मेरे दोस्त।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, August 7, 2016
अनुराग शुक्ला
Labels:
hafeezkidwai,
poetry
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