Wednesday, August 3, 2016

गायब ज़िन्दगी

अच्छा तुम ही बताओ मेरे गले से निवाला कैसे उतरे।तुम्हे पता है यह जो सामने मोबाईल पड़ा है, इसे बार बार देखता हूँ।एकटक न्यूज़ चैनल देख रहा हूँ,जबकि पता है इन्हें हममे कोई दिलचस्पी नही।रात में हल्की सी खट की आवाज़ जगा देती है की कोई दरवाज़े पर आया है।हमने इन दिनों मुस्कुराना छोड़ दिया।मुस्कुराना क्या होता है बल्कि आपस में बोलना बात करना छोड़ दिया है।आप नही समझेंगे,किसी अपने के होने या न होने की कशमकश।आपको क्या फ़िक्र की कौन बीती रात गए, घर लौटा और कौन नही।आप देशभक्ति का ज़िम्मा सिर्फ अपनी ज़बान पर ही तो लिए हैं।आपको क्या पता एक सैनिक के घर की तक़लीफ़।आज हफ़्तों से एक जहाज़ AN32गायब है।साथ में तीन दर्जन ज़िंदगियाँ गायब हैं।किसी को नहीं पता,कोई हलचल नही।उन परिवारों से पूछिये जिनका कोई है या नही है।वह रो भी नही पा रहे और मुस्कुरा भी नही पा रहे।दिल एक खुटके में हैं।आप और आपके न्यूज़ चैनल दुनिया की खुराफात बता रहे मगर मेरे अपनों का कोई ज़िक्र नही।हमे पता है, हमारी ज़िन्दगियो से कोई को सियासी फायदा तो होना नही, तो हमारी बाते भला क्यों हों।सरकार खामोश है,मीडिया को खुराफात से फुर्सत नही,दूसरे संगठनो के अपने मुद्दे हैं,आप अपने लिए लड़ रहे हैं।हमारा क्या है।सन्नाटा।ख़ामोशी।यह जो दर्द है यह कोई हिन्दू मुस्लिम का नही है।यहाँ दलित ब्राह्मण का ज़ायका नही है।यह दर्द उस सैनिक के परिवार का है जिसकी ज़िन्दगी पर सब मौन साधे हैं।कोई नही बता पा रहा की उनके घर का चराग़ है भी या नही।हमे और आपको सियासत से फुर्सत नही।एक दूसरे को नीचा दिखाने से फुर्सत नही।वहीं इतनी ज़िंदगियाँ पता नही कहाँ हैं।कोई न सुनने वाला न बताने वाला।एक बार अपने दिल को उधर ढकेल कर देखिये।अपने जिस्म को उस शून्य में रखिये।वह अँधेरे की सिसकियों को महसूस कीजिये जो रौशनी में रो भी नही पा रहीं।बात कीजिये उनसे।उन ज़िंदगियों के सवाल पूछिये।कैसे आप हँस ले रहे हैं जबकि पड़ोस में नीम ख़ामोशी है।उठिये और गिरेहबान पकड़ कर पूछिये की कहाँ हैं देश के बच्चे।यूँ हम उन्हें अकेला नही छोड़ेंगे।उनके परिवारो को थामिये।लग्ज़री कारों और वाई जेड सुरक्षा से लैस नेताओं से पूछिये की हमारी ज़िंदा आवाज़ें कहाँ हैं।अपने सांसदों से पूछिये की वह संसद में उन ज़िंदगियों की बात क्यों नही करते।एक जहाज़,जी पूरा भरा जहाज़ कई दर्जन ज़िंदगियों के साथ गायब हो गया और इसका कोई जवाबदेह नही।कोई ज़िक्र नही।फ़र्ज़ी कामो में उलझे रहने वालों, उठो और सवाल करो।सुन लो उन घरों का दर्द।दिमागों की सियासी सीलन को हटाकर सोचो,सवाल करो।बात है ज़िंदगियों की,कुछ तो बोल दो।अब तो राजनितिक छतरी छोड़कर खुले आसमान से सवाल करो।आजकी आपकी ख़ामोशी कल आपको अंदर से खा जाएगी।सेना की प्रोफाइल लगाने से कुछ नही होगा,उन गायब सैनिको के दर्द को आवाज़ दीजिये।पार्टी,संगठन,धर्म को किनारे रखकर उनकी फ़िक्र कीजिये।उस सन्नाटे को दूर कीजिये।अँधेरे में रौशनी कीजिये।आप और हम ही उस दर्द को महसूस कर सकते हैं।आइये और सवाल कीजिये,लिखिए,पूछिये,बोलिये,प्लीज़ कुछ तो कीजिये।कुछ तो कीजिये।©

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