Thursday, August 25, 2016

बजबजाती व्यवस्था

एक आदमी अपनी बीवी की लाश लिए जा रहा।सब के सब विचलित हो गए।किसी का मन टूटा तो किसी का दिल फट कर बाहर आ गया।मुझे फ़र्क नही पड़ता।बिलकुल फ़र्क नही पड़ता।आप बारह किलोमीटर की बात कर रहे हैं मैंने यहीं बारह घण्टे एक लाश को बिना कपड़े देखा है।जब पहुँचा तो मेरा फटा अंगौछा उस लाश के काम आया।अभी साल भर पहले की एक लाश याद है सड़क किनारे पड़ी थी और उसके पाँच छोटे छोटे बच्चे रातभर उस लाश के पास खेलते और रोते रहे।पूरी रात के बाद अगली सुबह दस बजे उसे बाँस में बांध कर लेकर गए।सही बताऊँ कीचड़ में करीब दस के करीब लड़की के भ्रूण को कुत्तो को जिसने नोचते देखा हो,उसे वह लाश की तस्वीर नही डराएगी।मैं उस ज़िंदा लाश को भी तो देख चुका हूँ जिसे 24 लड़को ने रात भर नोचा और मरा हुआ जानकर सड़क पर फेक दिया।लोगो ने उस लड़की को ज़िंदा पाया जबकि मुझे उसकी मरी हुई आँखे आजभी नही भूलती।यह तो लाश है मैंने जेल में बन बारह बारह सालो से बन उन नौजवानों को भी देखा है जो हज़ार रूपये मुआवज़ा नही जमा कर पा रहे और उनके माँ बाप ज़िंदा से मुर्दा हो चुके,वह नौजवान जेल में ज़िंदा जिस्म के साथ मुर्दा रूह लिए बस वक़्त काट रहे।
वोह कौन सा अपराध है जिसे हम सबने नही देखा।हमे अफसोस होता है, मगर दो कदम नही निकलते।हाँ अगर मामला धर्म का हो तो हम सैकड़ो मील चल सकते हैं।धर्म की रक्षा के नामपर हथियार उठा सकते हैं मगर व्यवस्था की रक्षा के नामपर सिर्फ अफ़सोस।क्यों नही बेईमान अफसरों को खींचकर सड़क पर लाते हो।क्यों नही भृष्ट,कामचोरो को पीटने के वीडियो बनाते हो।पता है क्यों,क्योकि करप्शन,बेईमानी में कोई तुम्हारा ही अपना लगा होगा।मैं इस व्यवस्था से ज़रा भी विचलित नही होता।न ही ज़रा भी हैरत होती है।वह आदमी तो एक लाश कन्धे पर लिए हुए है।यहाँ तो सब मरे हुए हैं, कोई कन्धा भी नही है।हम सब मरे,बदबूदार कट्टरपन से भरे दिमाग भर हैं।यह देश ऐसे करोणों नफ़रत से भरे मरे हुए दिमागों को ढो रहा है।इसलिए कोई विचलन नही।कोई सिहरन नही।कोई अफसोस भी नही।बस इंतज़ार की कब हमारे कन्धे पर हमारी सड़ी हुई लाश हो और किनारे खड़े लाखो सड़े हुए जिस्म हम पर अफसोस करें।बेहद अफसोस।अथाह अफसोस।©

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