Tuesday, August 9, 2016

लुटा पिटा ज़मींदार

एक झटके में जमींदारी गयी।हज़ारो बीघा का मालिक जिस्म भर के ज़मीनी टुकड़े में सिमट गया। अनाज से भरे जाने वाले सैकड़ो गोदामो में कुत्ते लौटने लगे। बग्घी के घोड़ो को उसने आज़ाद कर दिया क्योकि अब  भूख से लड़ने की बारी उसकी थी। लम्बे लम्बे बरामदे और उसमे बिछी सफ़ेद चादर सूनी हो गई।हुक्कों की आग बुझ गई।आवाज़ की कड़क धीमी हो गई।शेरवानी दीवान में चली गई और सादे से कुर्ते पैजामे ने जिस्म को ढक लिया।ताम्बे के बर्तनो की जगह अल्मुनियम ने लेली।चीनी की प्लेट चिटख गईं।चिटखन के निशान हर बर्तन पर ऊसर ज़मीन सी तस्वीर बनाने लगे।ज़मीदार हरियाली के बावह खूब लड़ा अपने आप से,अपने बच्चो के मायूस चेहरे देख कर। खूब तड़पा क्योकि उसके हाथ में कोई हुनर नहीं था। हमेशा खरीदने वाले हाथो ने बेचना शुरू किया। ज़ेवर,बर्तन यहाँ तक गरारो के लचके गोटे तक बिके। अपने सामने मुह बाए बड़ी हवेली देखता फिर जेब। सिसकता हुआ दीवारों पर लगी काई को देखता रहा।अपने बचपन में आखरी बार पुती हुई दीवारों को देख उसे एहसास हो गया था की इस ज़िन्दगी में उसकी तरह यह कोठी अब दोबारा नही चमकेगी।ज़िन्दगी की सीलन में खुश था ,की चलो उसकी हज़ारो बीघा ज़मीन  सैकड़ो का पेट भरेगी। सैकड़ो को वह एहसास देगी जो उसकी पुश्तो ने सैकड़ो साल उठाया। असर भी हुआ ज़मीन  पाया हर शख्स आगे बढ़ चला और वह जमींदार सबसे पीछे।हर शख्स आगे बढ़ बढ़ दूर बढ़ गया,ज़मीदार पिछड़ते पिछड़ते इतना पिछड़ गया की अब लोगो को उसका नाम भी याद नही।अपनों बच्चो को  रियासत की कहानी सुनाते सुनाते  हाशिये पर बैठा वह ज़मीदार दुनिया से कूच कर गया। लोगो ने पुर अक़ीदत से कहा मियां अच्छे  जमींदार थे।©

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