इसे पूरा मत पढ़ियेगा फ़ालतू आपको अफसोस जताना पड़ेगा।यह जो आप बार बार कह रहे हैं की बच्चियो का बलात्कार हुआ है।लड़कियो का बलात्कार हुआ है।झूठ बोलते हैं आप।आपकी पुरानी आदत है झूठ बोलने की,अपनी बदसूरती पर पर्दा डालने की।हिम्मत हो तो हमसे सच सुनिए।बलात्कार आपका हुआ है।बलात्कार हमारा हुआ है।बलात्कार समाज का हुआ है।यह जो इज़्ज़त रौंदी गई है, वह आपकी इज़्ज़त थी।शीशे को देखिये,सच्चाई से आँखे मत फेरिये।सच बताइये जब आपका बलात्कार हो रहा था,तो कोई आया था बचाने।जब इसी ज़मीन पर समाज को नँगा किया जा रहा था तब हम क्यों खामोश थे।क्या समाज की इज़्ज़त पर शैतान के खरोच के निशान हमारे आपके घरों से नही निकले।वह जो लड़के थे,वह हमारे समाज का हिस्सा नही थे क्या।वह जिन्होंने हाइवे पर आपके कपड़े उतारकर ठहाके लगाए थे,वह आपकी चौखट के नही थे।जब समाज इनके सामने बेबस,सिसक कर, गिड़गिड़ाकर छोड़ देने की भीख माँग रहा था,तब यह हमारे सपोले खिलखिला नही रहे थे।जब यह कोर्ट में होंगे तो हमारे ही वकील इन्हें बचाने की जीतोड़ मेहनत नही करेंगे।वही वकील जो हर एक पर हाथ उठा लेते हैं, इनके मुकदमे लड़ने के लिए खुद लड़ेंगे।आप ज़रा भी आँखे मत चुराइए।
हाँ आपका ही बलात्कार हुआ है।आपने धर्म,दल,संगठन,रिश्तेदारी,दोस्ती में बहुत बार गुनाहों पर पर्दा डाला है।शैतान को नँगा नाच करने की खूब छुट दी है।अपने घरों में शैतानो को चारा डाला है।आखिर इन खूँखार जानवरों ने हमारा बलात्कार कर ही दिया।जब जब हम सियासत की खाल ओढ़कर अपने निकम्मेपन को छुपाएंगे तब तब हमारे समाज पर शैतान खरोच मारते रहेंगे।और हाँ आपकी तो पुरानी आदत है की बलात्कार होने वाले को अकेला छोड़ देने की।आप बलात्कार करने वाले का बहिष्कार कभी नही कर पाओगे।आप जब कभी विरोध करोगे तो सियासी झंडो में लिपटा हुआ विरोध।कभी बिना सियासी बैसाखी के नही निकलोगे।मैं अभी कह रहा हूँ की समाज को बचाए रखना है तो पहले बहकना छोड़ दो।यह सियासी लोग सिर्फ आरोप आरोप खेलते रहेंगे,कभी तुम्हारी इज़्ज़त को नही बचाएँगे।यह मान लो की यह बलात्कार तुम्हारा और हमारा था।चलो निकलो घर से और हर तरह के लफंगे,बदमाश,गुंडे को खींच के सलाखों में डाल दो।जो गुंडई और हिँसा से लड़ भी सकता है वह बलात्कार भी कर सकता है।अभी कह रहा हूँ किसी पार्टी,संगठन,धर्म,जाति, बिरादरी के बहकावे में मत आओ।हर बुरे को बुरा कहो।उससे लड़ो।उसकी मुखालफत करो।घरों से निकलो।चलो मेरा तुमसे वादा है, अपने समाज के लिए अंत तक लड़ूंगा।आखरी साँस तक जूझुंगा।तुम्हारे सामनेअपनी ख़ून की आखरी बून्द भी बहा दूँगा,मगर तुम उठो।किसी धर्म वर्म से ज़्यादा समाज को बचाना ज़रूरी है।आओ अपने बलात्कार को खुद रोके।खुद हर उससे सवाल करें जो हमारी हिफाज़त के लिए ऐसी में आराम फ़रमा हैं।उनसे पूँछे जो खुद तो कई स्तरीय सुरक्षा में हैं और हमारा समाज निहत्था कमज़ोर सा खड़ा है।बिना फ़र्क़ हर उससे पूछें जो खुद तो ख़ाकी वर्दी से घिरे रहते हैं और हमारे समाज को बिना वर्दी छोड़कर मज़े करते हैं।आओ अपनी आवाज़ खुद बने।यूँ सिसक सिसक के मरने से अच्छा है, लड़कर मर जाना।चलो उठो,कन्धे से कन्धा मिलाओ और अपने बलात्कार को रोको।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, August 1, 2016
बलात्कार
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