कश्मीर न जन्नत है, न ही खूबसूरत ज़मीन का टुकड़ा।यह सिर्फ और सिर्फ एक प्रयोगशाला है।यहाँ इंसान नही रहते,यहाँ वह जिस्म हैं जिनपर सिर्फ प्रयोग किया जाता है।अब ज़रा देर छदम् देशभक्ति को किनारे रख दीजिये।अपने अपने धर्मो के चोंगे उतारकर खूंटियों पर टांग दीजिये।आइये एक एक कप चाय साथ लेकर बैठिये।देखिये यह एक प्रयोगशाला है की नही।देश में आने वाले हर उन्नत हथियार को प्रयोग करने की इससे खूबसूरत जगह कोई हो सकती है।पहले के हथियारों का ज़िक्र करके आपके उचाट हो चुके मन को नही थाकाएंगे।हम अभी की बात करते हैं।आपने पैलेट गन का प्रयोग किया।सैकड़ो की आँखे चली गई।जिस्म पर आपकी सोच के तारा मण्डल बन गए।दुनिया को लगा यह तो हैवानियत है तब आपने देखा और कहा ओह गलत हुआ।यह पैलेट ठीक नही हैं।अब से इनके लिए मिर्ची बम ठीक रहेगा।वह इन्हें बेहोश कर देगा।इनकी लड़कियो को भी बेहोश कर देगा,शायद बेहोश जिस्म कुछ काम आ जाए।खैर छोड़ो,मिर्ची बम देखो।हम बताएं जब यह भी प्रयोग हो जाएगा तब आप कालीमिर्च बम का भी लगे हाथ प्रैक्टिकल कर लीजियेगा।वैसे उस बम का भी प्रयोग करिये न जो ज़बान को खत्म कर देता।ताज्जुब है की आप पोखरण गए थे परमाणु बम का प्रयोग करने,अगर कश्मीर में किया होता तो अच्छा प्रयोग होता।मैं शुरू से देखूं तो यह वाक़ई प्रयोगशाला ही तो है।राजा हरी सिंह,शेख अब्दुल्लाह,कथित सांस्कृतिक संगठन,राजनितिक दल,धार्मिक कट्टरपंथी,आतंकवादी,अलगाववादी सबके लिए प्रयोगशाला।कश्मीरी पंडितो का पलायन भी तो एक प्रयोग था।यहाँ प्रयोग खूब हुए हैं और डिस्टिल वाटर की जगह इंसानों के ख़ून का खूब इस्तेमाल हुआ है।मैं घर में उस मंत्री की बात के ज़िक्र को सुनता रहा हूँ जिसकी घनिष्ट दोस्ती जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्लाह दोनों से रही है।जिसके बुलावे पर शेख बिना शक किये दिल्ली आ गए और गिरफ्तार हो गए।जिसकी कोशिश से कश्मीर में चरमपंथी किनारे हो गए थे।वह रफ़ी अहमद क़िदवई थे,जिनकी अचानक मौत ने उस कदम को तोड़ दिया जिससे कश्मीर में मरहम लगता था।कुछ बेहतर रास्ता निकल सकता था।अब उनको भी ज़रा ढूंढिये जो किसी भी हाल में कश्मीर में सुकून नही देखना चाहते थे।नेहरू को बदनाम करने के लिए नेहरू को बिना बताए वह कौन था जिसने शेख की गिरफ्तारी का आदेश दिया।वोह कौन लोग थे जो कश्मीर में धार्मिक विद्रोह के बीज बो रहे थे।मैं लिखूं तो किताब भर जाए।ऐसा नही है की कश्मीर में इकतरफा नफ़रत बोई गई है।यहाँ नफ़रत का किसी ने पेड़ लगाया,तो किसी ने खाद डाली तो किसी ने पानी डाला।बड़े सलीक़े से इस प्रयोगशाला में नफ़रत को पाला गया है।जब शेख धोखे से गिरफ्तार हुए तो उनके ही उत्तराधिकारी ने उनसे मुँह मोड़ा।
शेख अब्दुल्लाह के उत्तराधिकारी बख्शी गुलाम मोहम्मद थे।रफ़ी अहमद क़िदवई ने उनसे कहा की हम भरसक कोशिश करके शेख को रिहा करवा लेंगे।बख्शी ने जवाब दिया शेख के रिहा होने के मायने हैं की मेरा हट जाना।तब रफ़ी अहमद क़िदवई ने कहा की इससे कोई फ़र्क नही पड़ता की कौन आता है और कौन जाता।शेख का रिहा होना कश्मीर के लिए ज़रूरी है।कश्मीर में सुकून देश के लिए ज़रूरी है और मैं देश के लिए कोई भी कदम उठा सकता हूँ।रफ़ी अहमद ने संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि डॉ. ग्राहम को भी भारत बुलाया था तब भारतीय मुसलमानो ने कश्मीर को भारत का अटूट अंग और कश्मीरी संविधान सभा पर पूरा विश्वास और पाकिस्तान के दावे के विपरीत हस्ताक्षर का ज्ञापन दिया था।जिसका पॉज़िटिव असर रहा और बाहरी देश इससे दूर ही रहे।
रफ़ी अहमद क़िदवई आखरी दम तक यह कहते रहे की कश्मीर को नासूर बनने से पहले हमे उसे उसके नेचर के साथ अपनाना होगा।
मैं उन सभी सालों को लिख सकता हूँ जिसमे कश्मीर में प्रयोग की नीव रखी गई।मेरे लिए इतिहास बड़ा महत्व अब नही रखता।मैं आपमें से बहुतों के बहुत से उलटे सीधे कमेंट पर कान भी नही धरता।मेरे लिए कश्मीर को भारत के अभिन्न अंग के साथ उसे प्रयोगशाला बनने से रोकना भी है।मेरे लिए ज़मीन की अहमियत इंसान की अहमियत से ज़्यादा नही है।कितना गन्दा लगता है सुनते हुए की अब इनपर पैलेट की जगह मिर्ची बम डाली जाए।मुझे नही लगता की इनमे से किसी के पास इसे सुलझाने की समझ या नियत है।कश्मीर पर हर बात करने वाला बढ़िया तर्क रखता है मगर उस तर्क में कश्मीरियत नही होती।मैं नही कहता की मेरा हर लफ्ज़ सही ही है मगर इतना तो देखिये जो हम कश्मीर में करते हैं वैसे देश के दूसरे हिस्सों में भला करते हैं।पुलिस पर पत्थर मारने वालो को हम एक जैसा बर्ताव करते हैं, नहीं।मेरी सिर्फ इतनी ख्वाहिश है की कश्मीर को प्रयोगशाला मत बनाइये।वहाँ इंसान हैं, चूहे नहीं।एक एक इंसान की उतनी ही अहमियत है जितनी आपकी और हमारी है।इसे बहुत से राज्यो में होने वाले चुनाव में फायदा लेने वाला भी प्रयोग मत बनाइये।आपकी ज़बरदस्ती,वोट तो दिलवा देगी मगर देश को कमज़ोर कर देगी।देश को पहले रखिये।देश जोड़ने से मज़बूत होता है तोड़ने से कमज़ोर।देखिये की हमारी हरकते जोड़ने वाली हैं या तोड़ने वाली।कश्मीर का हल हो सकता है बशर्ते आप ईमानदारी से हल चाहते हों।हमारे मुल्क़ की बेहतरी के लिए एक बार धर्म,चुनावी फायदे को किनारे कर के ईमानदारी से बैठिये ताकि कश्मीर में सुकून आए तो साथ ही मुल्क़ में सुकून आए।टूटे,मायूस,बिखरे हुए दिलों पर कभी कोई देश मज़बूत नही हो पाया है।समझिये और आगे बढ़िए। #हैशटैग #hashtag ©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, August 28, 2016
कश्मीर
Labels:
hafeezkidwai,
kashmir,
Love,
piece
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment