एक चीज़ समझ नही आ रही की यह घमौरियाँ यानि अंधौरियाँ क्यों खत्म हो गई।पहले गर्मियों में कितनी होती थी,अब देखने को नही मिलती।आखिर वह कौन सी हवा है जो बदल गई।बचपन में दाने निकलना तो आम होता था,अब देखने को नही मिलते।यह वह मामूली सी बीमारियाँ थी जो गर्मी को और खूबसूरत बनाती थीं।एक बीमारी थी जिसमें बच्चे के दोनों गाल फूल जाते थे,ज़बरदस्त सूजन से,वह भी अब नही दीखता।धीरे धीरे यह घरेलू बीमारियाँ भी खत्म ही हो गई।एक वजह यह भी है की या तो हमारी नज़र में यह नही हैं, या वाक़ई यह खत्म हो गई।चिलचिलाती गर्मी में उमस के साथ ही खूबसूरत अंधौरियो का धावा होता था।गर्दन,माथा तो इनके खेलने की जगह होता था।एक बारिश के बाद फुँसी, फुड़ियो की बहार आ जाती थी।पैर के ज़्यादतर हिस्सों और खुले हुए हाथों में इनका आतँक होता था।मैं सोचता हूँ अब के बच्चे कितने कमज़ोर होंगे,जब यह ज़िन्दगी के इन मामूली से दर्द से नही गुज़रेंगे तो कैसे बड़ी तकलीफो से लड़ेंगे।एक बात और की कहीं इनके बोझ से स्कूल बैग को देखकर दाने,फोड़े,फुँसी,घमौरियाँ तरस खाकर भाग न जाते हों।गुज़रा बचपन हल्की हल्की परेशानियो से जूझता था,अबका बचपन बड़ी मोटी मोटी किताबो से,ताज्जुब है आपके बचपन की वह मोटी मोटी किताबें पिछले बचपन में आवारगी से घूमने वाली,घमौरियों वाली गर्दन ने लिखी हैं।खैर जो भी हो पिछले वक़्त की हल्की हल्की बीमारियो को याद कीजिये,उनका इलाज याद कीजिये और बड़ों की बेफिक्री सोचिये आपको कल की खूबसूरत हवा महसूस होने लगेगी।उस दर्द में भी नीम की ठण्डी हवा,उस तक़लीफ़ में बारिश की सारी बौछारें आपको चेहरे पर पड़ती हुई महसूस होंगी।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, June 25, 2016
वोह बारिश के दिन
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