मौसीक़ी को क्या समझते हैं।आपका बोलना,बोलने की लय, लय का उठान,उठान का गिरना,गिरने की खनक,खनक की झनकार,झनकार की गूजँ,गूँज की धुन है मौसिकी।मौसीकि नें मुझे हमेशा खीचा और जंगल ने हददर्जे सुकून दिया।बड़े लम्बे वक्त बाद जान पाया मौसीकि और जंगल का रिश्ता।हमेशा माना की मौसिकी को ब्रह्मा ने पैदा किया,भरत मुनि ने अप्सराओ तक पहुँचाया फिर नारद मुनि इसे आकाश की खूबसूरत अप्सराओ से लेकर ज़मीन पर लाए।
वैसे महादेव और हज़रत दाउद नें भी अपने अपने अन्दाज़ में इसे दुनियाँ में आम किया।वैसे भी हमारे हर विकास की सीढ़ी जँगल से ही होकर गुज़रती है।वह जँगल जिन्हें हम विकास का सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं।तभी तो अंधाधुंध खत्म कर रहे हैं।तो सुनिए इन जंगलो ने हमे खाना,रहना,साँसों के सिवा क्या दिया है।मौसिकी यानि म्यूज़िक का आधार दिया है।जँगल का मतलब सिर्फ पेड़ नही बल्कि पूरी एक संस्कृती,जिसमे जानवर भी हैं।सारेगामापा हमे उन्हीं जंगलो के जानवरो की आवाज़ से ही मिला है।
मोर(खड़ज)सा,पपीहा(रखब)रे,बकरी(गंधार)गा,कुलंग(मद्धम)मा,कोयल(पंचम)पा,घोड़ा(धैवत)धा,हाथी(निखाद)नी।यूँ सारेगामा करते जँगल को देखा तभी कहे जंगल क्यो रूह को सुकून देता है।हमारे जैसों का दिल कंक्रीट की दीवारो में कहा लगता बल्कि पत्तियो की आवाज़ हमे गिज़ा देती है।सारा दुनियावी तामझाम कुदरत की आवाज़ में खलल है और वह आवाज़ है मौसिकी।मूसिकर चिड़िया के नाम से मौसिकी आज भी मुझमें ज़िन्दा है।
आप भी जंगलो को महसूस कीजिये जैसे बुद्ध ने किया था।जंगलो से बात कीजिये जैसे महावीर ने किया था।जंगलो को समझिये जैसे राम ने समझा था।जंगलो से खेलिए जैसे कृष्ण खेलते थे।जँगल को अपनाइये जैसे आदम ने अपनाया था।जँगल वह स्कूल है जो आपको आदिमानव से महामानव बनाता है।यह तो मौसिकी है हम तो सब कुछ जँगल से ही पैदा होते देख रहे हैं।बस आजकल लोग जँगल की खूबियों को बिना अपनाये जँगली होते जा रहे हैं।©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Saturday, June 4, 2016
धुन तनक धुन
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