शायद हम सबमें सबसे ज़्यादा वह मार खाता था।एक ही गलती की सज़ा उसे पूरे क्लास से ज़्यादा मिलती थी।जानते हैं क्यों,क्योंकि वह सबसे बदसूरत था।शुरू में पता ही नही चलता था यह फ़र्क लेकिन उम्र बढ़ते बढ़ते एहसास हो गया की खूबसूरती के क्या फायदे हैं और बदसूरती के क्या नुकसान।टीचर गोरे, टमाटर से लाल बच्चों को कम मारते थे शायद दिल पसीज जाता होगा।उनकी मार का कोटा कम रँग के बदसूरतो पर पूरा किया जाता था।ज़रा हल्के से दिमाग पर ज़ोर दीजिये और उन टीचर्स को ज़रूर याद कीजिये जिन्होंने यह फ़र्क किया।यहाँ तक खूबसूरत लड़को के पास दोस्तों की कमी नही होती।जब किसी खूबसूरत बच्चे को धूप में खड़ा होने की सज़ा मिलती तो उसकी सुर्ख़ होती खाल पर अच्छे अच्छे पिघल जाते मगर काले रँग पर इस धूप का क्या असर,बेचारे वह भुगतते रहते।हाथो पर छड़ी पड़ते वक़्त नाज़ुक हाथ तो एक ही के बाद बख्श दिए जाते जबकि सख्त जान को अनगिनत छड़ियों से नवाज़ा जाता।घर में भी खूबसूरत बच्चे के लिए सारे रँग होते हैं जबकि बदसूरत के लिए कुछ गिनती के रँग।मेरे तो यह फ़र्क तब समझ आया जब स्टीव जॉब्स ने एक इंटरव्यू में कहा की खूबसूरती और डिज़ाइन हमेशा बिकाऊ होती है।तब लगा वाक़ई लेकिन वह कैसी खूबसूरती जो रँग में आकर ठहर जाए।अब गोरे रँग पर मरने वालों को कौन बताए कृष्ण की सियाह खूबसूरती।कौन इन्हें मूसा के सांवलेपन की माँग बताए।वैसे एक बार पलट कर देखिये की आपने कितनी बार खूबसूरत लोगों के लिए सीट छोड़ी है।कितनी बार खूबसूरती से रीझकर आपने दूसरे को जगह दी है।कितनी बार उबाल मार रहे गुस्से को खूबसूरत गलती के सामने ठंडा किया है।यहाँ तक सख्त दोपहर में गाड़ी को सड़क पर टक्कर मारने वाले खूबसूरत शख्स को माफ़ किया है।बदसूरती या खूबसूरती हमारे बस की नही फिर भी नाज़ुक हो या सख्त दिल दोनों खूबसूरती की तरफ झुक ही जाते हैं।यही तो खूबसूरती का फ़रेब है।पिछले सारे फ़रेब याद कीजिये और मुस्कुराइए की क्या गजब की थी वह खूबसूरती।©
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