Tuesday, June 21, 2016

मैं धर्म हूँ

मै जब तुममे दाखिल होता हूँ। तुम्हारी अंदरूनी खूबसूरती निखर आती है।तुम्हे दुनिया अच्छी लगने लगती है क्योकि तुमने उसे सँवारने के लिए मुझे चुना था। तुम्हे हर तरफ मोहब्बत और ख़ुलूस दिखता है।तुम हर बेचैन आँख को देख कर तड़प उठते हो। जब तक मै तुम्हारे अन्दर होता हूँ तब तक तुम इंसानियत की खुशबु से महकते हो।तुममे जब मैं होता हूँ तब तुम सख्त से सख्त ज़ुल्म से निपट लेते हो।हर परेशानियों से लड़ लेते हो।तुम इतना खूबसूरत किरदार बनाते हो की हज़ार दो हज़ार नही करोणों अरबों में लोग इंसान हो जाते हैं।एक दूसरे का कन्धा बन जाते हैं।एक दूसरे के आँसू पोछ डालते हैं।गले मिलकर वह मुस्कान बिखेरते हैं जिससे यह ज़मीन खिलखिलाकर हँस देती है।मेरी रूह तुम्हारी ज़िन्दगी में सलीक़ा,मोहब्बत और सब्र लाती है।
मगर हाँ मगर
जैसे ही मै तुम्हारे दोस्त,परिवार,घर,खानपान,खेल,पहनावा,सोच,पढाई,व्यापार,नौकरी, और पसंद नापसन्द में घुसता हूँ वैसे ही एक ज़हर सा हो जाता हूँ.वो ज़हर जो ऊपर कही हर बात को जुठ्ला  देता है और तुम्हे मुझे इन्सान से हैवान बनाने में देर नहीं लगती।जैसे ही मैं एक फ़र्क़ के साथ तुम्हारी मगरूरियत से जुड़ता हूँ तो विनाश बन जाता हूँ।जैसे ही तुम्हारे झूठे मन गढ़न्त किस्सों में शामिल होता हूँ शैतान हो जाता हूँ।जैसे ही तुम्हारे रिश्तों में दाखिल होता हूँ तो मुस्कान को आँसू में बदल देता हूँ।तुम्हारी महत्वकांक्षा में घुसता हूँ तो ज़ुल्म की सारी हदें तोड़ देता हूँ।
अब तक तुम्हे पता चल गया होगा मै कौन हूँ। 
मै धर्म हूँ।मैं धर्म हूँ।मैं धर्म हूँ।
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