हाँ तो भैय्या यह बताओ की तुमने कौन सी मिज़ाइल बना दी है।मिज़ाइल छोड़ो पंखे का मोटर ही कौन सा बना दिया है।अच्छा यह भी छोड़ो,विज्ञान की कोई किताब लिखी है।मैं भी नास्तिक क्यों हूँ इस पर लाखों शब्दों की किताब लिख सकता हूँ।सुबह से शाम तक धार्मिक लोगों या धर्म की तफ़रीह उड़ा सकता हूँ।भगवान या ख़ुदा के वजूद पर वह तंज कर सकता हूँ,जो तुम चाहकर भी नही कर सकते।मैं धार्मिक क्यों हूँ,इस पर करोणों शब्द लिख सकता हूँ।जिन्नात,हूरों,देवताओं, राक्षसो के किस्सों से किताबे भर सकते हैं।क़ुरान और वेद पर थोड़ा बहुत कह सुन सकते हैं,मगर इसका मतलब यह नही की विज्ञानं और वैज्ञानिको को तमाशा बना दूँ।नास्तिको की प्रैक्टिकल बातों को सिरे से काटने लगूँ,यह नही हो सकता।मेरे लिए आस्तिक या नास्तिक होना बेहद आसान है।दूसरे की कमियों से रफ भरना भी बेहद आसान है, मगर इनको समझना बेहद कठिन है।मैं अपने बारे में कहता हूँ की अभी मैं आस्तिक और नास्तिक को समझ रहा हूँ,पता नही कितना वक़्त लगे।मेरी राय एक घण्टे,एक किताब,एक व्यक्ति,एक पैगम्बर,एक देवता पर नही टिकने वाली।मैं इनको समझने में लगा हूँ,पता नही इसकी मंज़िल क्या हो।वैसे मुझे मंज़िल से ज़्यादा रास्ते पसन्द हैं।मैं मंज़िल को प्यार नही करता।चाहता हूँ की उम्र इन रास्तों में कट जाए।मैं आस्तिक नास्तिक को सिर्फ रास्ता समझता हूँ।इनको देखता हूँ तो सोचता हूँ की क्या दिन रात विज्ञानं और भौतिक बातो को करने वाले कोई चीज़ खोज रहे हैं या विज्ञानं को पूज रहे हैं।जो आस्तिक हैं, वह ईश्वर,धर्म को समझ भी रहे हैं या सिर्फ पूजने में लगे हैं।मैं माजिद दरियाबादी की प्रैक्टिकल ज़िन्दगी के ज़्यादा करीब हूँ।कभी कभी खुसरु तो कभी कार्लमार्क्स तो कभी लेनिन तो रूसो या गाँधी के करीब चला जाता हूँ।मेरी उम्र सीखने की है हो सकता है पूरी उम्र सीखने में लग जाए।फिर भी मैं अभी किसी नतीजे पर नही पहुंचना चाहता।थोड़ा रुकिये,हमसे बहस मत कीजिये,हमे रास्ता दीजिये,सहयोग कीजिये ताकि यह रास्ता कट जाए।वैसे काँटे भी बिछाइयेगा तो क्या आपके पैगम्बर और आपके ही मार्क्स और लेनिन से सीख कर निकल जाएँगे।यह ज़िन्दगी सीखने के लिए कुर्बान,यहीं सीखा हुआ अल्लम् गल्लम् लिख कर जाऊँगा।दोस्त,तुम मुस्कुराते हुए लाल पीले होते रहो।©
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