Monday, June 27, 2016

बेमिसाल सब्र

एक खन्जर से जिस जिस्म को वह ख़तम करने चला था,वह दुनिया में ऐसा चमका,ऐसा चमका की पूरी क़ायनात ही रौशनी से भर उठी।उनमें नरमी ऐसी की मोम भी उनसे सीखे।ताक़त इतनी की उस दौर में सबसे ज़्यादा।मोहब्बत इतनी की खुशबू अब तक है।इल्म इतना की इल्म का बादशाह।ख़िदमत ऐसी की मिसाल या यूँ कहे हर फ़न में तारीख़ गढ़ने वाली मिसाल।जिनकी पैदाइश का गवाह काबा और शहादत का मन्ज़र मस्जिद ने देखा हो उनकी तारीफ़ में क्या कहें, उनकी खुशबू को किन लफ़्ज़ों में समेटे,वह तो हर मासूमियत में हैं।यही तो हैं हज़रत अली।अथाह ताक़त के बावजूद दिल में अथाह नरमी।
मेरा दिल जब डूबने को होता है तब उसे सहारा देते हैं मेरे अली।उनका किरदार बोलता है।आवाम के लिए उनके जिस्म का हिस्सा हिस्सा लगा था।अली ने सूफ़िज़्म की वह नीव रखी जिसकी आगोश में सारा जहाँ आ गया।जब उन्होंने मोहब्बत से बाहे फैलाई पूरी आवाम सर झुका के खड़ी हो गई।हर एक के सवाल,परेशानी,दर्द,तकलीफ़ में जिसने फाहे का काम किया वह अली थे।जब आँखों में अँधेरा और मुस्तकबिल में कालिख़ दिखी तब रौशनी का काम किया अली ने।मेरे अली ने हर दर्द में चीरा लगाया।हर तकलीफ़ में मरहम लगाया।इंसानियत को अपनी मोहब्बत और दूर की सोच से ऐसा रास्ता दिखाया की राह आसान हो गई।उनके सामने ज्ञान,कला,विज्ञान,धर्म,दृष्टि,विचार ने ऐसी तरक्की की की उसका असर आज तक है।अगर ज़रा भी दिल में काम की,इल्म की,मोहब्बत की,ख़िदमत की गुंजाईश हो तो हज़रत अली को पढ़िए।
जिन्होंने हज़ारों साल पहले वह कह दिया जिसकी आज भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी तब थी।अपने क़ातिल तक के लिए कहा की इसको सिर्फ इतनी ही सज़ा देना जितना इसका गुनाह है।मुल्क,मज़हब,सोच,पार्टी का बन्धन खोलकर जब उन्हें पढ़ेंगे तब अली की दिखाई राह के मज़े ले पाएँगे जैसी सूफी आजतक लेते आए हैं।आज 21वीं रमज़ान उनकी शहादत का दिन है,एक बीमार दिमाग के ग़ुलाम ने उन्हें खत्म करना चाहा था।अली जिस्म से लोगों की रूह में उतर गए।यह उन्हें ज़िन्दगी में उतारने का वक़्त है।अली कल,आज और कल ज़रूरी रहेंगे क्योकि वह रौशनी हैं।इल्म की रौशनी।©

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