Sunday, June 19, 2016

गुलबर्ग

यह लीजिये गुलबर्ग का फ़ैसला हो गया।कितना खूबसूरत फ़ैसला है वारे जाऊँ।अब सवाल उठाऊ तो मारा जाऊ।अभी ठहाका मारकर किसी के हँसने की आवाज़ सुनी,पहचानने की कोशिश की तो देखा अहसान जाफ़री थे।वही जो गुलबर्ग में हवा में फायरिंग कर रहे थे।जिनकी वजह से मासूम से हज़ारों लोग सैकड़ो का खून करने उतावले हो गए थे।अच्छा हुआ बच्चू तुम्हारा न्याय भीड़ ने कर दिया वरना यह फायरिंग आज तुम्हे फाँसी के फंदे पर ज़रूर ले जाती।सुबह से दोपहर के एक बज गए थे,सोसायटी मामूली सी ही तो लुटी थी,तुम्हारा सब्र टूट गया इतनी जल्दी।लायसेंसी रिवाल्वर वैसे भी दिखाने के लिए होती है, डराने के लिए नही।और हाँ वह औरतें भी कहकहे लगा रही हैं, जिनका सामूहिक बलात्कार करके जला दिया गया,झूठी।इतनी भीड़ में कोई मर्द था भी,अगर था भी तो सबके सामने कोई कैसे बलात्कार कर सकता है,उसे शर्म नही आएगी।हमारी संस्कृति में खुलेआम सम्भोग मना है,तो बलात्कार कैसा।मर गए हो सबके सब मगर झूठ नही छूटा।कहो अच्छा है हमारी आँखों में पट्टी नही बँधी थी,वरना बेचारे,मासूम,कोमल,सरल स्वाभाव के कथित आरोपियों को फाँसी हो जाती।अब उस बच्चे की मौत के लिए कोई खाए पिए घबरु जवानो को फाँसी तो नही दे देगा ना।जहाँ इतने मर रहे थे वहां वह छः महीने के बच्चे को भुनता हुआ भला कौन देख पाता।जाओ एहसान जाफ़री और रोस्टेड लोगों,तुम्हारा इंसाफ हो गया।गुलबर्ग की रूहों तुम्हारा इंसाफ उसी दिन हो गया था जब तुम्हे इस हालत में पहुँचाने वाला दोबारा कुर्सी पर ठहाके मारकर हँस रहा था।तुम्हारी मौत को पिल्ले की मौत से मिलाकर मन ही मन बल्लियों उछल रहा था।अब उसकी मुस्कान में तुम्हारे बलात्कार की चींखे छुप चुकी हैं।उसके सिल्क के कुर्तों में तुम्हारे टुकड़ो के धब्बे अब नही रह गए।तुम हाशिमपुरा भूल गए,उसमे तो कोई गुनहगार नही था,गुलबर्ग में तो कम से कम कुछ लोगो को मजबूरी में जेल भेज दिया।जाओ जो मिला है हँसी ख़ुशी लेलो।अब चले जाओ।अब तो पीछा छोड़ दो।अब तो बस यह गुलबर्ग बन करदो।अब चैन से सोने दो।जाओ यहाँ से।

No comments:

Post a Comment