किसी ने पूछा की क्या दरवेश या सूफ़ी कभी कभी कोई गुनाह भी कर सकते हैं।बिलकुल अगर वह भूख के बगैर एक लुकमा भी खाते हैं, तो ज़रूर कर सकते हैं।सूफ़ी के लिए बिना भूख खाना बड़ा गुनाह है।यह जवाब रूमी का था।वही जो अफगानिस्तान में बल्ख़ि, ईरान में मौलवी,तुर्की में मौलाना और हिंदुस्तान में रूमी कहलाए।मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी।वही रूमी जिनके वालिद ने गुज़रे हुए दौर को कानून की सबसे एतबार वाली किताब किताबुल मआरिफ़ दिया था।कहते हैं रूमी की मसनविया इस किताब के बेअदब नक़ल थीं।बल्ख़,बगदाद,मक्का,दमिश्क में टहलते हुए रूमी ने अथाह इल्म हासिल किया।रूह में इल्म की इसकदर बेचैनी थी की कहीं सुकून नही था।आखिर में अनातोलिया के मरकज़ कोन्या में रूमी ने पड़ाव डाला।रूमी ने हर तरह के इल्म को सीखा, परखा फिर सिखाया।एक सुनार की हथौड़ी और पटड़े की आवाज़ ने रूमी को ऐसा मोहा की इस मामूली सी धुन पर भी रूमी बोल उठे
ज़रकोबी की दुकान से एक खज़ाना मिला नायाब,
अजब सूरत अजब माएगी,क्या बात।क्या बात।।
रूमी ने हर उस चीज़ को मसनवी में ढाला जिसे उन्होंने महसूस किया।सबसे पहली मसनवी की किताब भी रूमी के हाथों लिखी गई।उम्र ने अगर और वफ़ा किया होता तो रूमी ने ज़मीन से आसमान तक सब पर मसनवी लिख डाली होती।वो जो फ़क़ीर था वही उस दौर में इल्म का बादशाह था।मसनवी का सुल्तान था।यह रूमी का ही दिल था जिसने उस्ताद,दोस्त,शागिर्द सबको मोहब्बत से समेटा।हर एक के गुज़रने पर ज़िन्दगी का ज़ायका बदला।रूमी ने इल्म की वह चादर फैलाई जिसकी रौशनी अफगान से तुर्की तक एक हो गई।हिन्द की सरहद में भी रूमी का कलाम दाखिल हो गया।मोहब्बत के लिए सरहद छोटी पड़ गई और ज़माने ने रूमी को रुमानियत में ढाल उसके एहसास को जी लिया।थोड़ा सा वक़्त हो तो सूफ़िज़्म को पढ़ लीजिये।दिल में नरमी हो तो रूमी को अपना लीजिये।ज़माने को खूबसूरत बनाना हो तो सूफियाना हो जाइये।मैं जब रूमी को देखता हूँ।जी देखता हूँ तो शक में आ जाता हूँ की कोई कैसे इतना लिख पढ़ सकता है।कोशिश करता हूँ मगर रूमी की चौखट तक भी नही पहुँचता।इल्म के समन्दर का किनारा छूने की कोशिश ताउम्र करता रहूँगा।बस रूमी तुम यूँहीं मेरी नज़रों के सामने रहना।बस ऐसे ही मुस्कुराते रहना।
©
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Friday, May 27, 2016
रूमी
Labels:
hafeezkidwai,
Love,
rumi,
sufi,
sufiyana
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment