एक दामाद ससुराल आए।ससुराल में गन्दे फर्श,गंदी नाली देख नाक भंव चढ़ाई।त्योरियों ने माथा ढक लिया।फिर ऐंठ कर बोले यह नाली कितनी गंदी है।देखो पर्दे भी नही धोए।तुम लोगो को तो चबूतरा भी साफ़ नही करना आता।ससुराल वाले शर्मिंदा से खड़े।थोड़ा चाय नाश्ता किया कि फिर एतराज़ तुम लोगो को घर का जाला भी नही दिखता।अपनी बुआ का घर ही देखो चमकता रहता है।उन्ही से सीख लो कुछ।सीखोगे भी कैसे बात करने तक की तमीज़ नही है।सरदर्द है यहां आना,रूकना और जीना तो महाभारत है।उसी वक़्त घर का बेटा घर में आता है।नाली खुद साफ़ करता है।जाला साफ़ करता है और कहता है जीजा थोड़ा सा ध्यान नही दे पाए वर्ना यह घर भी आपको अपने घर जैसा लगता।ज़रा से दूसरे कामों में लग गए तो यह रह गया वरना आपको इतना सुनाना नही पड़ता और हाँ जैसा भी हो मेरे लिये मेरा घर ही जन्नत है।इस जन्नत को साफ़ रखने के लिये फ़रिश्तो की जरूरत नही।हम खुद बढ़ कर सुधार लेंगे।तो अब हमे भी खुद सोचना होगा की अपने मुल्क के लिए हम बेटे हैं या दामाद।हम मुल्क की कमियां गिनाते हैं या उन्हें सुधरते है।अपने नेताओं,महापुरुषों,योजनाओं, विचारों की आलोचना करते रहते हैं या आगे बढ़ कर बेहतर रास्ता बनाते हैं।तनकीद से बेहतर है क़ी काम करें।मुल्क़ को ज़रूरत ख़िदमत,मोहब्बत की है उसमें लगिए।हिंदुस्तान को तरक्की के रास्ते पर दामाद बन कर नही ले जाया जा सकता।मुल्क का बेटा या बेटी बनिए।जी तोड़ मेहनत कीजिये।हमें यक़ीन है हम तस्वीर ज़रूर बदलेंगे और हाँ कट्टर हिन्दू-मुसलमानो को साढू भाइयों की तरह जलन,हसद में लड़ने दीजिये।यह कुढ़ कुढ़ कर मिट ही जाएँगे।इनसे पीछा छुड़ाआइये हम सब मिलकर मोहब्बत के साथ तरक़्क़ी की तरफ बढ़ चलें।
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