Tuesday, May 17, 2016

आशिकी तृतीय

अब बेतुकी बात मत करना।पहले ही कह चुका हूँ मुझे बहुत डर लगता है।कोई देख गया तो,खैर तुमसे बातें करें वह भी छुप छुप कर।मेरे जिगरा नही है।एक तो तुम यही फ़र्क़ देख लो न की तुम आलिमत जैसे मज़हबी कोर्स में हो मैं एक नम्बर का गैर मज़हबी।जब तुम सलाम करती हो लगता है मैं किसी मदरसे की चौखट पर खड़ा हूँ।तुम जैसे ही खिड़की से झाँकती हो मुझे अपने आप अज़ान सुनाई देने लगती है।जब तुम मुझ पर हाथ रखती हो लगता है मलकुल मौत रूह निकाल रही है और हाँ ख़त तो मत ही लिखा करो,दुनिया कहाँ पहुँच गई तुम अब भी कलम और कागज़ में अटकी हो।वो भी उर्दू में खत,पढ़ने मे ही मोहब्बत की बैंड बज जाए।जाओ और कोई बढ़िया खूब बालों वाली दाढ़ी वाला घबरु मौलाना ढूंढ लो,यहाँ तो तुम्हारा ईमान ही टूट जाएगा।अब यह न कहना की तुम मुझमे ही सारी क़ायनात देखती हो।वैसे भी मुझे इतनी क़ुरान की आयते याद नही जितनी तुम हम पर पढ़ कर फूंका करती हो।मुँह पर फूँकते वक़्त यह भी ख्याल नही रखती की तुम्हारी बीमारी के जरासीम मुझमे भी आ जाएँगे।माना की तुम बेहद खूबसूरत हो मगर यह तो बताओ मेरे अलावा कौन यह खूबसूरती देख पाया है।पर्दा इतना तगड़ा जैसे मिस्र की ममी।कमबख्त अपने अमीर दोस्तो को तुम्हारी खूबसूरती दिखा कर जला भी नही पाउँगा।मैं तमाम कमियां निकालता रहा और वह एक बेहद खूबसूरत,नूरानी चेहरे वाले मौलाना की दुल्हन हो गई।मौलाना की दाढ़ी में जितने बाल थे उतने तो मेरे जिस्म भर में नही थे।वो मौलाना अमरीका,यूरोप,गल्फ़ के बच्चों की क्लास ऑनलाइन लेते हैं।हद तो तब हुई जब उसने मुझसे औरों से ज़्यादा गाढ़ा पर्दा कर डाला।अपने बच्चे से मामू भी नही कहलवाया।मौलानी होती ही हैं ऐसी,जाओ मैंने तुम्हे हमेशा के लिए भुला दिया,दफा हो जाओ मेरे ज़हन से। ©

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