Friday, May 13, 2016

यह मैच नही है।

अच्छे और बुरे दिन के बीच फुटबॉल बना कर रख दिया है।लोग मर रहे हैं और समर्थक और विरोधी खेल रहे हैं।भावनाएँ, सम्वेदनाएँ,मानवता सब राजनीती का घिनौना खेल खेल रही हैं।मुझे अफसोस होता है की हर मौत सियासत के पैमाने पर कसी जाती है फिर नफा नुकसान देख उस मौत पर तांडव होता है।केरल,बिहार,झारखण्ड,मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़,उत्तर प्रदेश वीभत्स मौत से जूझ रहे हैं मगर सियासत है तो वह इनपर अपनी अपनी हांडी चढ़ाए ज़ायके का इंतज़ार कर रही है।
सबसे खूबसूरत तो मासूम यह जनता है जो बड़ी खूबसूरती से अपने बनाए साँचे में फिट है।हर समर्थक को अपनी  अपनी सरकारों में राम राज्य दिखता है।मानसिक गुलामी का तो स्तर यह है की सामने हो रहे हर गलत काम को वह यज्ञ की आहुति समझ नज़र अंदाज़ किये हुए हैं।जबकि अवाम का फ़र्ज़ है गिरेहबान पकड़ कर केरल,यूपी,बिहार,झारखण्ड,एमपी,हरियाणा समेत राज्य और केंद्र सरकार से पूँछे की क्या हमे तुम्हे चुनने की सज़ा दी जा रही है।नितीश से सवाल करिये की क्या मौत और मौत के लिए उन्हें बिठाया गया था।शिवराज से तो एक लम्बी फेहरिस्त है जिसका हिसाब पूछना चाहिए।चांडी मौत के सवालों से भाग नही सकते।इसे कांग्रेस,भाजपा या अन्य का खेल मत बनाइये ,की अपनी सुविधा से मैच खेलिए।एक सिरे से नकारिये।पत्रकार मारे जा रहे हैं मगर एक मुर्दा ख़ामोशी पूरी बिरादरी को लपेटे है।ठीक भी है हर एक का नम्बर आएगा आज नही तो कल।आज उनके बच्चे भाई बहन अपने मुर्दा रिश्ते से लिपटे रो बिलख रहे हैं कल आप की भी लाशो से शायद कोई लिपटा रोएगा।जिनको लगता है यह सब पहले क्यों लिखा या कहा क्यों नही गया वह जाए और चुल्लू भर पानी में डूब मरे।क्योंकी मानसिक गुलामो की तो पहले भी यहाँ कोई ज़रूरत नहीं।जिनके दिल साफ हैं वह एक सिरे से हर एक गलत से निपटें बिना फ़र्क के।बार बार कहता हूँ मरने से पहले मत मरो दोस्त।

No comments:

Post a Comment