कुशाग्र ने पापा को देखते ही कहा।छुट्टियाँ हो गई मुझे बाहर घूमने जाना है।मनजीत ने सलीक़े से समझाया बेटा कहीं बाहर जाने से अच्छा है पहले अपने शहर को जान लो।लखनऊ खुद में अथाह खूबसूरती समेटे है, पहले वह देख लो तब बाहर घूमने जाना।चलो आज शाम में तुम्हे कैसरबाग के महलों में ले चलते हैं।अच्छा पापा,लेकिन वह तो अक्सर देखते रहते हैं।पहले तुम उन्हें बाहर से देखते थे आज हम तुम्हें अंदर से दिखाएंगे,जिससे तुम उस दौर की रूह महसूस कर सको।शाम हुई दोनों बाप बेटे इंदिरानगर से सीधे कैसरबाग पहुँच गए।रास्ते भर तरह तरह की बातें और कुशाग्र के सवाल।आई टी कालेज,हनुमान मन्दिर होते हुए वह सीधे सआदत खान के मकबरे पर पहुँचे।पार्क में बैठकर मनजीत ने कुशाग्र को इमारतों के इतिहास के बारे में बताने लगे।कुशाग्र को भी दिलचस्पी आ रही थी की तभी उसने एक पुरानी इमारत की मरम्मत देख पूछा पापा यह कौन सा महल है और इसको क्यों तोड़ रहे हैं।बेटा इसे तोड़ नही रहे हैं बना रहे हैं, सही कर रहे हैं।अच्छा क्यों सही कर रहे हैं और कौन कर रहा है।यह जो तुम्हे खण्डहर नुमा महल दिख रहे हैं यह कभी ठहाकों से आबाद रहते थे।नवाब यही पर अपनी सल्तनत को ऊंचाई पर ले जा रहे थे।शुक्र करो की मौजूदा सरकार ने कैसरबाग हैरिटेज ज़ोन बना दिया।करोड़ो रूपये हमारी विरासत को बचाने के लिए खर्च किये जा रहे हैं।यह इमारते अब सम्भल जाएंगी साथ ही नवाबो के किस्से भी सम्भल जाएँगे।अगर इनकी मरम्मत न की जाती तो तुम्हारे बड़े होने तक इनका वजूद ही खत्म हो जाता।अच्छा पापा कुछ तो बताइये नवाब के बारे में।चलो ठीक है मैं तुम्हे नवाब नसीरुद्दीन की जवानी का एक किस्सा सुनाता हूँ।
"हमेशा की तरह बादशाह नसीरुद्दीन अपने बेगम मलिका ए ज़मानी के महल दोपहर में दाखिल हुए।बेगम ने ख़ूब प्यार उंडेलते हुए कहा,नवाब साहब कहिये आपकी क्या ख़िदमत की जाए।नवाब नसीरुद्दीन ने प्यास का इशारा किया।एक इशारे पर एक बाँदी थाल में गिलास लेकर हाज़िर हुई।नवाब ने बड़ी गौर से उस बाँदी को देखा और कहा"आज से पहले तो तुम्हे नही देखा,नई हो क्या"जवाब में बाँदी ने हाँ में सर हिला दिया।नवाब साहब को तफ़रीह सूझी और गिलास का बचा पानी बाँदी पर छिड़क दिया।बदले में बाँदी ने थाल में गिरा पानी नवाब साहब पर उलट दिया।नवाब गुस्से में लाल पीले हो गए और बोले एक बाँदी की यह हिम्मत की नवाब से गुस्ताखी।तभी बाँदी बोली"जब दो हम उम्र लोग तफ़रीह करते हैं तो लिहाज़ नही किया जाता और ना ही बुरा माना जाता है।"नवाब को जवाब भा जाता है।खैर बाँदी को उसकी गुस्ताखी की सज़ा मलिका ए ज़मानी देती हैं और उसे महल से निकाल दिया जाता है।अब जब भी नवाब आते तो बाँदी का ज़िक्र छेड़ देते,यह बात मलिका को नागवार गुज़रती।आखिरकार अपने वज़ीर की मदद से नवाब साहब बाँदी को बुलवा लेते हैं।निकाह करके अपनी बेगम बना लेते हैं बाँदी को नाम दिया जाता है कुदसिया बेगम।कुदसिया बेगम बड़े नेक दिल की थी जल्द ही नवाब साहब के दिल ओ ज़हन पर कब्ज़ा कर गई।गोमती किनारे खड़े बेगम कुदसिया चाँद निहार रही थीं।पूर्णिमा का चाँद पानी से टकराकर बेगम कुदसिया पर बिखर रहा था।इस ज़बरदस्त खूबसूरती पर न्योछावर होकर नवाब उस रात ही कुदसिया बेगम को मलिका ए ज़मानी बना देते हैं और उन्हें ख़िताब देते हैं मलिका आफाक कुदसिया सुल्तान मरियम बानो बेगम साहिबा मलिका ए ज़मानी।नई बेगम का जलवा अवध में बोलने लगा मगर यह ज़्यादा दिन नही चला।नवाब साहब ने बेगम कुदसिया महल के लिए कोठी दर्शन विलास बनाई।उसी में कुदसिया महल को नवाब साहब की नाराज़गी का पता चला।किसी ने नवाब साहब के कान भर दिए थे की कुदसिया बेगम किसी और मर्द को चाहती हैं।नवाब साहब गुस्से में उनसे दूर चले गए।कुदसिया बेगम ने मन मसोसकर ज़हर खा लिया।जब नवाब साहब को पता चला तो वह नंगे पैर भागे हुए अपनी महबूब बेगम के पास आए और उनका सर अपने पैरो पर रख रोने लगे।तभी भीगी आँखों और लरज़ती ज़बान से कुदसिया महल ने नवाब नसीरुद्दीन से कहा"मेरे हमसफ़र,मेरे मालिक,मेरी आपसे पहली शर्त थी की आप मुझे शक की नज़र से नही देखेंगे।जिसे हज़रत ने तोड़ दिया।मैंने निकाह की रात अर्ज़ किया था की आपकी नज़र बदलते ही मेरी हस्ती मिट जाएगी।जब मालूम हुआ हुज़ूर की नज़र फिर गई तो मैंने अपना क़ौल निभाया।आपकी कुदसिया सिर्फ आपकी थी।यह कोठी दर्शन विलास हमारी पाकीज़गी की गवाह रहेगी।इसके हर दर ओ दीवार हमारी मोहब्बत के गवाह होंगे।"कहते कहते कुदसिया महल खत्म हो गई।कुछ अरसे बाद ही नवाब नसीरुद्दीन को भी ज़हर दे दिया गया।दोनों आज भी इरादत नगर की कर्बला में साथ साथ दफ़न हैं।
कुशाग्र का दिल बैठ सा रहा था।बोला पापा इन इमारतों का संवरना वाक़ई ज़रूरी है।अगर आज यह न होती तो हम एक खूबसूरत दास्तान को न सुन पाते।अच्छा हुआ सरकार हैरिटेज की तरफ ध्यान दे रही है।इन इमारतों पर जो नई रौशनी बिखर रही है वह अवध,कैसरबाग और नवाबो की दस्तानो को हमेशा ज़िंदा रखेंगे।आप पापा सही कहते हैं हर इमारत अपनी कहानियो में ज़िंदा रहती है।अब से छुट्टियों भर रोज़ शाम आपके साथ इनको देखूंगा।महसूस करूँगा।थैंक यू पापा।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Tuesday, May 31, 2016
क़तरा क़तरा अवध
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